2022 के यूपी विधानसभा चुनाव: पूर्व मेयरों की अवहेलना क्यों! क्या वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज कर भाजपा का दोबारा सत्ता में आने का सपना ?

0
269

2022 में यूपी विधानसभा चुनावों को लेकर हर स्तर पर मंथन चल रहा है। और लगभग यह तय हो ही चुका है कि अगर कोई बहुत बड़ी बात नहीं होती है तो भाजपा सीएम योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ेगी।
जितना समाचार पत्रों में पढ़ने सुनने को मिल रहा है उससे पता चलता है कि अपनी मंशा पूरी करने तथा दोबारा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने के लिए भाजपा के नेता गली मोहल्लें और कार्यकर्ता से लेकर बड़े नेताओं को भाजपा में शामिल करने का कोई मौका उनके समर्थकों के मत प्राप्त करने के लिए नहीं छोड़ रहे है।
सवाल यह उठता है कि अपनों को धक्का और औरो को गले लगाने से किसान आंदोलन के चलते क्या सत्ताधारी पार्टी अपना मनोरथ पूर्ण करने में सफल हो पाएगी।
होगा क्या यह तो मतगणना होने के बाद ही पता चल पाएगा लेकिन अपनों की नाराजगी और अवहेलना कहीं भाजपा को महंगी ना पड़ जाए। इस बात को ध्यान में रखते हुए बड़े नेताओं को समय रहते सोच विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि कोई भी दल चाहे राजनीतिक हो या अन्य सब में उसे आगे बढ़ाने व लोकप्रिय बनाने का काम उसके युवा करते हैं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। तथा वर्तमान में कोरोना के दौरान आर्थिक मानसिक और सामाजिक रूप से परेशान और किसान आंदोलन से जुड़े लोगों को छोड़ दे तो भाजपा के अपने युवा उसके साथ नजर आते हैं। लेकिन उनमें भी एक कसक दिखाई देती है कि केंद्र हो या प्रदेश की सरकारें सबके विभिन्न मंत्रालयों की गठित होने वाली कमेटियों में जनप्रतिनिधि के रूप में मनोयन से संबंध बड़ी तादात में पद खाली पड़े है लेकिन पार्टी और सरकार उन पर नियमानुसार मनोनयन कर अपने कार्यकर्ताओं को महिमामंडन करने में क्यो चूक रही है।
केंद्र में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार गठित हुई और ज्यादातर प्रदेशों में भाजपा ने सत्ता संभाली तो संगठन के कुछ नेताओं द्वारा कहा गया था कि पुराने नेताओं को सम्मान देकर उनके अनुभवों का लाभ युवाओं को प्राप्त हो इसके लिए जनसंघ से लेकर अब तक जुड़े रहे वरिष्ठ नेताओं की दिल्ली तक सम्मेलन विचार गोष्ठियां आयोजित कर उनके अभिनंदन किए जाएंगे। लेकिन ऐसा पूर्ण स्तर पर हुआ हो लगता नहीं है। कुछ माह पूर्व उप्र सरकार में मंत्री रहे वरिष्ठ भाजपा नेता रामचंद वाल्मिकी को अंतिम समय तक यह मलाल रहा कि पार्टी के लोगों ने उनकी सुध नहीं ली और उन्हें मुख्य धारा से जोड़े रखने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखाई।
वर्तमान में कितने ही स्थानीय निकायों के पूर्व अध्यक्ष सरकारी पदों पर रहे पार्टी नेताओं सहित भाजपा अपने पूर्व मेयरों तक की सुध नहीं ले रही लगती है। अपने मुंह से तो कोई कुछ नहीं कहता है लेकिन पार्टी की बैठकों और बड़े नेताओं के आगमन पर जिस सम्मान अपनेपन के साथ शहर के प्रथम मेयर रह चुके पूर्व मेयरों को ना बुलाने से यह दुखी तो नजर आते हैं लेकिन कहते कुछ नहीं है। अकेले मेरठ शहर में इस समय भाजपा के मेयर रह चुके सुशील गुर्जर, मधु गुर्जर और हरिकांत अहलूवालिया, डाॅ लक्ष्मीकांत वाजपेयी एक्टिव और जनमानस में लोकप्रिय रहे लेकिन वर्तमान में इन्हें कहीं कोई इनकी गरिमा के अनुसार भाजपाई पूछते हो या अपनी विचार गोष्ठियों में बुलाते हो अथवा बड़े नेताओं के आगमन पर बुलाते हो ऐसा पता नहीं चलता है। क्या इन परिस्थियितों में भाजपा ने अगर सुधार न हीं किया तो वो अपने मकसद में क्या सफल हो सकती है इसको लेकर खासकर भाजपा के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं में चर्चा सुनी जाती है। कुछ लोगों का कहना है कि पार्टी द्वारा भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष रहे पूर्व मंत्री ब्राहमण व जनमानस के नेता डाॅ लक्ष्मीकांत वाजपेयी व पूर्व विधायक अमित अग्रवाल को भी जिस स्तर पर साथ जोड़कर चलना चाहिए वो नजर नहीं आता है।

– रवि कुमार विश्नोई
सम्पादक – दैनिक केसर खुशबू टाईम्स
अध्यक्ष – ऑल इंडिया न्यूज पेपर्स एसोसिएशन
आईना, सोशल मीडिया एसोसिएशन (एसएमए)
MD – www.tazzakhabar.com

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

4 × 5 =