आॅल इंडिया न्यूज पेपर एसोसिएशन आईना की मांग, सूचना प्रसारण मंत्री दे ध्यान! प्रिंट मीडिया में ब्लैकमेलिंग व फर्जीवाड़े व खबरों में खेल की बात कहने से पहले डीएवीपी के अधिकारियों की कराए जांच, नौकरी में आने से पहले इनकी आर्थिक स्थिति क्या थी और आज क्या है

0
792

पिं्रट मीडिया मे ब्लैकमेलिंग व फर्जीवाड़े पर केंद्र सरकार सख्त 2016 में बने डीएवीपी से संबंध नियमों में बदलाव किये जाने की सूचना खबरों के खेल में बंद होंगे विज्ञापन होगी वसूली भी की जा सकती है। केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी जी दे ध्यान दीजिए। एक अखबार में छपी यह खबर अगर सही है तो शायद प्रिंट मीडिया के संचालकों को भी इसमे कोई परेशानी होने वाली नहीं है। क्योंकि जो ब्लैकमेलिंग और फर्जीवाड़े की व खबरों के खेले जाने की बात प्रिंट मीडिया को लेकर कहीं जा रही है। उनका अवलोकन कर यह लगता है कि यह सब जान बूझकर प्रिंट मीडिया को बदनाम करने व उत्पीड़न के लिये किया जा रहा है। लेकिन अगर आप निष्पक्ष होकर कार्रवाई करें तो शायद किसी को कोई एतराज नहीं होगा। लेकिन आॅल इंडिया न्यूज पेपर एसोसिएशन आईना आपसे मांग करती है कि मीडिया के खिलाफ कार्रवाई करने से पूर्व ऐसी स्थिति पैदा करने के लिये डीएवीपी के उन अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ की जाए सख्ती से कार्रवाई। और जांच करायी जाए कि जब विज्ञापन मान्यता जारी करने से संबंध रहे। और वर्तमान में हैं जब यह अधिकारी व कर्मचारी इस सेवा में भर्ती हुए थे तब उनकी आर्थिक स्थिति क्या थी और आज क्या है।
क्योंकि मुझे लगता है कि जो कानून पिछले तीन साल में सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा समाचार पत्र संचालकों के लिये बनाए गए हैं उनके लिये कहीं न कहंी डीएवीपी के अधिकारी पूरी तौर पर दोषी है। नहीं तो जिन अखबारों के विज्ञापन की मान्यता रद हो रही है उन्हे विज्ञापन मान्यता पर खरा न उतरने के बाद भी क्यों मान्यता दी गई।
सूचना मंत्री जी आज भी विभाग में जो अधिकारी विज्ञापन मान्यता देने का काम कर रहे है अगर किसी ख्ुाफिया एजेंसी से उनकी जांच करायी जाए तो अनेक मामले ऐसे खुलकर सामने आएंगे जिनमे कुछ लोगों को जानबूझकर ज्यादा विज्ञापन दिया जा रहा है और कई को पात्र न होने के बाद भी मान्यता रिनूव्यल कर दी गई और जो समाचार पत्र संचालक नियम अनुसार अपने अखबारों का प्रकाशन कर रहे है। उन्हे परेशान किया जा रहा है। इसलिये आप प्रिंट मीडिया के विरूद्ध विभिन्न बिंदुओं को आधार बनाकर कार्रवाई करने से पहले डीएवीपी के अधिकारियों के खिलाफ जांच कराकर कार्रवाई करें।
समाचार पत्र संचालक दे ध्यान इससे संबंध एक समाचार पत्र में छपी खबर इस प्रकार है। डीएवीपी की विज्ञापन नीति 2016 में होगा फेरबदल
अखबारों में फर्जी, अपुष्ट या सुनी सुनाई खबरें छापने से पहले मीडिया घरानों को सोच विचार करना होगा। यदि कोई फेक न्यूज पाई गई तो उस समाचार संगठन का विज्ञापन रोक दिया जाएगा। यदि पुरानी खबरों में भी कोई गलत खबर पाई गई तो विज्ञापन नहीं मिलेगा। केंद्र सरकार डीएवीपी की विज्ञापन नीति -2016 में फेरबदल करने वाली है। यह फेरबदल मीडिया में शुचिता लाने के लिए किया जा रहा है। वैसे तो, सामान्य तौर पर प्रतिष्ठित अखबार फर्जी खबर नहीं छापते, लेकिन कभी-कभी कुछ मीडिया संस्थानों की तरफ से ब्लैकमेल करने या बदनाम करने की मंशा से झूठी खबरें छापने या खबरों को तोड़-मरोड़कर छापने की शिकायतें मिलती रहती हैं। भारतीय प्रेस परिषद को इस तरह की शिकायतें मिलती हैं और परिषद उनकी निंदा करती रही है। तमाम सलाह मशविरे के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने फेक न्यूज से निपटने को विज्ञापन नीति में फेरदबदल का प्रस्ताव किया है। इसके मुताबिक, विज्ञापन नीति-2016 के अनुबंध-25 में परिवर्तन किया जा रहा है। अनुबंध को फिर से परिभाषित किया जा रहा है। इसमें अनैतिक व गलत धारणा से प्रकाशित या फर्जी खबर पाए जाने को भी जोड़ा जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि डीएवीपी इस काम में प्रेस कौंसिल और पीआईबी की मदद ले सकता है। इससे पहले डीएवीपी ने गलत और पत्रकारिता के मूल्यों का उल्लंघन करने वाले कुछ अखबारों का विज्ञापन दो महीने के लिए रोका था, लेकिन यह प्रेस कौंसिल की सिफारिश पर किया गया था। अब सरकार विज्ञापन नीति में ही प्रावधान करने जा रही है ताकि फर्जी और ब्लैकमेल करने वाली खबर छापने से पहले बार-बार सोचें। एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने प्रावधान का समर्थन करते हुए कहा कि क्या मीडिया के अंदर जिम्मेदारी का अहसास नहीं होना चाहिए। यदि कोई गलत कामों में लिप्त रहता है तो उसे रोकने के लिए नियम कानून बनाये जाते हैं। मालूम हो कि केंद्र की तरफ से सभी विज्ञापन डीएवीपी के जरिए अखबारों में प्रकाशित होते हैं। प्रसार संख्या और राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय और भाषायी आधार पर अखबारों को विज्ञापन दिए जाते हैं। पिछले एक साल से सरकार ने मीडिया में चल रहे फर्जीवाड़े को रोकने की कोशिश की है। पहले चरण में ऐसे अखबारों को हटाया गया जो सिर्फ विज्ञापन लेने के लिए छपते थे। दूसरे चरण में अनैतिक खबरें चलाने वाले अखबारों के विज्ञापन रोके गए और अब तीसरे चरण में विज्ञापन नीति में ही परिवर्तन किया जा रहा है।
सूचना मंत्री हमे लगता है कि अवश्यकता सुधार की डीएवीपी विभाग में अखबारों में नही। रही बात जिन बिंदुओं को लेकर यह सब करने की बात की जा रही है उनके लिये अखबार या उनके संचालक नही डीएवीपी के अफसर जिम्मेदार है इसलिये जांच उनकी हो पहले।

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here