बिना नेता के भीड़, फोर्स गायब और हो गई हिंसा

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मेरठ 4 अप्रैल। भारत बंद के दौरान गत सोमवार को हुई हिंसा ने सिस्टम की नाकामी की पोल खोल दी। 12 घंटे पहले खुफिया विभाग ने बवाल की आशंका जताते हुए रिपोर्ट सौंप दी थी, मगर पूरा तंत्र सोता रहा। बवाल से निपटने की रणनीति बनाने की बजाय अधिकारी रातभर खर्रांटे लेते रहे और सुबह बवाल हो गया। शहर हिंसा की आग में जलना शुरू हो गया था, इसके भी आधा घंटे बाद पुलिस मौके पर पहुंची। एलआईयू ने सबसे पहले अपनी एक रिपोर्ट शनिवार शाम छह बजे ईमेल के जरिये इंटेलीजेंस हैडक्वार्टर लखनऊ, एडीजी कानून व्यवस्था, कमिश्नर, एडीजी, डीएम और एसएसपी को भेजी थी। हालांकि इसमें केवल भारत बंद के संबंध में स्थानीय
जानकारी दी गई थी। इसके बाद एक और रिपोर्ट रविवार रात आठ बजे ईमेल से भेजी गई। इस रिपोर्ट में भारत बंद के दौरान मेरठ में होने वाले प्रदर्शन-हंगामे की विस्तृत जानकारी दी गई थी। यह भी बताया गया था कि प्रदर्शनकारी तेजगढ़ी चैराहा से यूनिवर्सिटी रोड होते हुए अंबेडकर चैक तक आएंगे। रास्ते में उनकी किसी से भी हिंसक झड़प हो सकती है। वे तोड़फोड़ भी कर सकते हैं। रिपोर्ट की सबसे उल्लेखनीय बात भीड़ के नेतृत्व को लेकर थी। इसमें स्पष्ट जिक्र किया गया कि भीड़ का नेतृत्व कोई एक नहीं, बल्कि सभी कर रहे हैं। ऐसे में आंदोलन हिंसक हो सकता है। बाकायदा खुफिया विभाग ने अपनी रिपोर्ट में वे रास्ते भी सुझाए थे, जहां पर बवाल हुआ है। हालांकि एलआईयू की रिपोर्ट में भीड़ का आंकलन थोड़ा कम जरूर किया गया। रात आठ बजे ईमेल के जरिये भेजी गई इस रिपोर्ट पर मेरठ से लखनऊ तक किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया। पूरा का पूरा सरकारी तंत्र खर्रांटे भरकर रातभर सोता रहा। सुबह जब तक अधिकारी सोकर उठे, तब तक मेरठ में हिंसा की लपटें उठ चुकी थीं। प्रदर्शनकारी न केवल तेजगढ़ी चैराहा से बढ़ते हुए अंबेडकर चैक तक पहुंचे, बल्कि कचहरी परिसर में आगजनी तक की। प्रदर्शनकारी जिस वक्त कचहरी पर पहुंचे, वहां केवल बीस पुलिसकर्मी तैनात थे। शोभापुर पर जिस वक्त बवाल हुआ, वहां सिर्फ छह पुलिसवाले मौजूद थे। कमोबेश यही स्थिति दूसरे बवाल वाले स्थानों पर थी। बवाल का इनपुट पहले से होने के बावजूद पर्याप्त मात्रा में पुलिस फोर्स की तैनाती नहीं की गई। एल ब्लाॅक शास्त्रीनगर और शोभापुर में सोमवार सुबह साढ़े आठ बजे हिंसा शुरू हो गई थी, मगर पुलिस फोर्स आधा घंटे बाद यानि 9 बजे पहुंची। एलआईयू की रिपोर्ट को पुलिस और प्रशासन के सारे अफसरों ने नजरअंदाज कर दिया। अब जब शहर में हिंसा हो गई तो सारे के सारे अधिकारी खुफिया विभाग की तमाम गोपनीय रिपोर्ट खोजते नजर आए। चूंकि अधिकारियों को अपनी गर्दन बचानी थी, इसलिए उन्होंने एलआईयू से ईमेल भेजने और प्राप्त होने का समय भी लिया। हालांकि अब अधिकारी कह रहे हैं कि उन्हें एलआईयू की कोई रिपोर्ट ही प्राप्त नहीं हुई।

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