दिव्यांग श्रेया बनी 2020 की टॉपर, IES हियरिंग कटेगरी में ऑल इंडिया रैंकिंग में नंबर वन

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सतना. जहां चाह वहां राह. कोशिश करने वालों की हार नहीं होती. कौन कहता है आसमां में सुराख हो नहीं सकता. ऐसे तमाम जुमले शायद श्रेया राय सरीखे प्रतिभावानों के लिए ही गढ़े गए हैं. श्रेया उन लोगों में से एक है जो न तो ठीक से सुन सकती और न ही बोल सकती. फिर भी उसने इंडियन इंजीनियरिंग सर्विसेस (IES)में हियरिंग कटेगरी में ऑल इंडिया रैंकिंग में नम्बर वन लाकर सबको हैरत में डाल दिया है.

देश भर में ऑलओवर रैंकिंग 60वीं है. यह उन लोगों के लिए एक मिसाल है जो नि:शक्तता की बैसाखी पर चलने की कोशिश करते हैं और जीवन के संघर्ष से हार मान लेते हैं. 25 साल की श्रेया मध्यमवर्गीय परिवार से हैं. मम्मी प्राइवेट स्कूल में वाइस प्रिंसपल हैं तो पापा शेयर मार्केटिंग का बिजनेस करते हैं. श्रेया के चेहरे पर हर पल इतनी मासूमियत रहती है कि लगता नहीं कि उसने आईईएस में अपनी कटेगरी में पहली रैंक अर्जित की है.

इससे पहले भी वह कई कम्पटीशन निकाल चुकी हैं मगर वह वहीं नहीं रुकी. श्रेया डेढ़ बरस की थी जब उसके मम्मी-पापा को पता चला कि वह सुन-बोल नहीं सकती. थोड़ा नर्वस हुए मगर उन्होंने ठान लिया कि बेटी को ऐसी परवरिश देनी है कि वह बेचारेपन की शिकार नहीं बल्कि सम्मान की हकदार बने. आज उनकी मेहनत रंग लाई और बेटी ने देशभर में नाम कमा लिया. श्रेया 2020 की टॉपर हैं. उनके सेलेक्शन का रिजल्ट अप्रैल में आया था. श्रेया सिर्फ हाई फ्रीक्वेंसी पर ही आवाज सुनती है पटाखे और प्रेशर हॉर्न.

जन्म से ही दिव्यांग श्रेया राय ने महज 25 वर्ष की उम्र में न केवल यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (यूपीएससी) की प्रतिष्ठा पूर्ण ऑल इंडिया इंजीनियरिंग सर्विसेस (आईईएस) परीक्षा में न केवल 60वीं रैंक हासिल की. बल्कि अखिल भारतीय स्तर पर श्रेया को हियरिंग कटेगरी में इंडिया टॉप करने का श्रेय भी मिला. मूक-बधिर बेटी की इस कामयाबी से मम्मी पापा खुश भी हैं और भावुक भी. जब वह महज साढ़े 3 साल की थी. आवाज देने वाले खिलौने भी उसे आकर्षित नहीं करते थे. इलाज के लिए मुंबई ले गए तो निराशा हाथ लगी. मासूम न बोल सकती थी न सुन सकती थी. वह प्रेशर हार्न या फिर तेज पटाखों की हाई फ्रीक्वेंसी आवाज को ही महसूस कर सकती थी. श्रेया के पिता कहते हैं हमने भी ठान लिया बेटी को नि:शक्त नहीं रहने देंगे. मां अंशु ने बेटी के लिए स्पीच थैरेपी भी सीखी.

सामान्य बच्चों की तरह चिन्मय मिशन के स्कूल में दाखिला दिलाया गया. नर्सरी से हायर सेकंडरी तक श्रेया ने यहीं हिंदी माध्यम से पढ़ाई पूरी की. मुश्किलों का दौर तब शुरु हुआ जब इलेक्ट्रिकल से बीई करने के लिए श्रेया इंदौर गई. मूक-बधिर बेटी के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई पहाड़ जैसी थी लेकिन श्रेया हार मानने वालों में नहीं थी. पढ़ाई में मददगार उसके दोस्त तो उसके लिए भगवान बन गए. आईएएस ऑफिसर और श्रेया के मामा शाश्वत राय का मार्ग दर्शन जहां पल-पल उसके साथ था. वहीं मैहर के अमदरा की आईएएस सुरभि गौतम भी उसकी प्रेरणा स्त्रोत थीं.

ग्रेजुएशन के दौरान ही वर्ष 2019 में श्रेया ने यूपीएससी के लिए पहला चांस लिया. उसने एक और कोशिश वर्ष 2020 में की. रोज 16 घंटे खूब पढ़ाई की. 12 अप्रैल को रिजल्ट आया तो कामयाबी हाथ में थी. वह 3 साल से यूपीएससी के आईईएस एग्जाम की तैयारी कर रही थी. इससे पहले श्रेया का सेलेक्शन कोल इंडिया न्यूक्लियर पावर कार्पोरेशन और पावर ग्रिड में भी हो चुका है लेकिन ये श्रेया की मंजिल नहीं थे. शुरु से ही उसकी दिलचस्पी कलेक्टर बनने में थी. मगर पैरेंट्स की खुशी के लिए उसने ब्यूरोक्रेट की जगह टेक्नोक्रेट बनने में ही अपनी खुशी समझी. अब यही उसकी मंजिल है. नेचर और क्लासिकल डांसिंग के विविध विषयों पर चित्रकारी श्रेया का खास शौक है.

यूपीएससी के 5 सदस्यीय बोर्ड के समक्ष इंटरव्यू के दौरान श्रेया राय की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी. बोल और सुन नहीं सकने के कारण साक्षात्कार के दौरान एक बड़ी सी स्क्रीन लगाई गई थी. बोर्ड मेंबर्स के सवालों को पहले टाइपराइटर पर टाइप किया जाता था फिर उसे बड़ी स्क्रीन पर शो किया जाता था. श्रेया जो जवाब लिखती थी उसे टाइप करके पुन: बड़ी स्क्रीन पर दर्शाया जाता था.

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