जरूरी नहीं है जो बीबीसी कहे वो सही हो, मोदी से संबंध डॉक्यूमेंट्री की हो जांच

0
78

भारत हो या अन्य देश ऐसी कोई जगह नहीं है जहां वर्तमान में हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम का चर्चा ना हो। यह भी किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है कि पीएम के रूप में उनके द्वारा अपना और देश का जो सम्मान अपनी वाकपुटता और कार्यकुशलता तथा मजबूत सोच के चलते कायम किया गया है। उससे सब जगह हमारी एक अलग पहचान उभरकर सामने आई है। शायद यही कारण है कि अमेरिका के राष्ट्रपति के पद पर कोई भी रहा हो सब पीएम मोदी के बारे में अच्छे विचार और देश के प्रति सौहार्द्र की बात करते ही नजर आ रहे हैं। हम देश का गणतंत्र दिवस मनाने के लिए तैयारियां में संलग्न हैं। हर व्यक्ति चाहे वह अमीर हो या गरीब देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत व्यक्तिगत रूप से पीएम मोदी की सब प्रशंसा कर रहे हैं। ऐसे में बीबीसी इंडिया ने द मोदी क्वेश्चन शीर्षक से दो भागों में एक नई सीरीज तैयार की। बीबीसी का दावा है कि यह सीरीज गुजरात में 2002 में हुए दंगों के विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करती है। उस समय नरेंद्र मोदी वहां मुख्यमंत्री थे। यह बात बिल्कुल सही है कि 2002 में जो दंगे वहां हुए उससे देश तो क्या दुनिया का संवेदनशील व्यक्ति दुखी रहा था। मगर शायद उस प्रकरण से वर्तमान में देश के पीएम मुक्त हो चुके हैं। और जहां तक पता है उनका कोई दोष भी सिद्ध नहीं हुआ। ऐसे में जब ज्यादातर आबादी उस घटना को भूल चुकी है। तो दो भागों की यह सीरीज दिखाने के पीछे बीबीसी कीक्या मंशा हो सकती है यह तो वहीं जान सकते हैं। मैं भी मीडिया से संबंध हूं और उसकी स्वतंत्रता बनी रहे इसके लिए कई दशक से प्रयासरत भी रहता हूं। लेकिन यह जो मामला है। इसका समर्थन किसी भी रूप में नहीं किया जा सकता। भारत की सरकार ने वृतचित्र इडिया मोदी को साझा करने वाले कई यूटयूब चैनलों को 21 जनवरी को ब्लॉक करने के निर्देश दिए। मेरा मानना है कि अपने देश में इन दो भागों के दिखाने पर पूर्ण प्रतिबंध किया जाना चाहिए क्योंकि बात सबके अपने प्रधानमंत्री के सम्मान की तो है ही नागरिकों की भावनाओं से भी यह मुददा जुड़ा हुआ है। और वैसे भी सोचे तो ऐसे प्रकरणों को उछालने से किसी को कुछ मिलता नहीं है लेकिन पीड़ितों के घाव तो हरे होते ही हैं। आम आदमी में भी इसको लेकर असंतोष व बदअमनी की भावना उत्पन्न होती है। मुझे लगता है कि केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय को बीबीसी के संचालकों को तथा ब्रिटेन की सरकार से इसको लेकर विरोध जताना चाहिए क्योंकि यह एक बड़े भारतीय जनसमूह की भावना जो मोदी को लेकर अच्छे ख्यालात रखते हैं उनका अपमान भी कहने में भी मुझे कोई हर्ज महसूस नहीं हो रहा है। मेरा तो मानना है कि अपने घर में हम कितना ही किसी मुददे पर वैचारिक मतभेद रखते हो और एक दूसरे का विरोध करते हैं लेकिन जहां प्रधानमंत्री की बात हो वहां हम सबको एक होकर इस प्रकार की संभावनाओं का विरोध करना चाहिए जो भविष्य में बदअमनी का कारण बन सकती हो क्योंकि प्रधानमंत्री किसी एक पार्टी का प्रतिनिधित्व नहीं करते वो देश का नेतृत्व कर रहे हैं। मैं कुछ लोगों की इस भावनाओं से भी सहमत हूं कि यह वृतचित्र जानबूझकर गलत जानकारी देने वाली दुष्प्रचार से संबंधित पत्रकारिता का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। और इन लोगों द्वारा जो बीबीसी की आलोचना की जा रही है वो भी गलत नहीं है।

वृतचित्र के दोनों भाग प्रचारित हो चुके हैं। अगर ध्यान से सोचे तो देश में कहीं भी इसको लेकर बहुत बड़ी चर्चा या बहस अभी तक शुरू नहीं हुई है। वो भी इस बात का प्रतीक है कि नागरिको ंने इस वृतचित्र के दोनों भागों को पसंद नहीं किया है। ऑल इंडिया न्यूज पेपर एसोसिएशन आईना के संस्थापक राष्ट्रीय महामंत्री अंकित बिश्नोई की यह मांग मुझे भी उचित लगती है कि इस वृतचित्र की स्वतंत्र जांच कराई जाए। निष्पक्ष और अनुभवी विचारधारा वाले नागरिकों को लेकर।
एक नई ऑनलाइन याचिका में इस मुददे को लेकर जो मांग की गई है में भी इसका समर्थन करता हूं और उन लोगों को भी बधाई देता हूं जिन्होंने 2500 से अधिक हस्तारक्षर कर इंडिया द मोदी को पत्रकारिता का हिस्सा ना बताकर बीबीसी की आलोचना की है।

विश्व का कोई सा भी देश हो सबके संविधान में अमीर गरीब सबको एक समान अधिकार दिए गए हैं। किसी के नामचीन या बड़े हो जाने पर उसे निरंकुश होकर काम करे ऐसी अनुमति किसी को नहीं है। हो सकता है कि बीबीसी प्रसार संख्या में ज्यादा हो ज्यादा देशों में देखा जाता हो लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उसकी हर बात को विश्वसनीय मान लिया जाए। मेरा मानना है कि इस प्रकरण में सबको मिलकर अपना विरोध व्यक्त करने में पीछे नहीं रहना चाहिए।
मुझे लगता है कि इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि आखिर 20 साल बाद ठीक देश के लोकसभा चुनाव जब होने वाले हैं उस समय गुजरात से संबंध 2002 के इस मुददे को इस समय उखाड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ी। क्या बीबीसी के लोगों को उस घटना के बारे में समीक्षा करने और वृतचित्र बनाने की बात दो दशक बाद समझ में आई और आई तो क्यों। दुनिया में अनेक ऐसे मुददे हैं जिनसे जनता परेशान है उनकी ओर ध्यान देने की बजाय इस विवादित मुददे को क्यों उछाला गया। इस पर भी गोपनीय चर्चा होनी चाहिए।

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here