रामचंद वाल्मीकि, मधु गुर्जर, अजय गुप्ता, कमल दत्त शर्मा, विनित शारदा अग्रवाल, सुशील गुर्जर की उम्मीदवारों से दूरी ठीक नहीं, भाजपा के पार्षद व मेयर पद के उम्मीदवारों के लिये बहुत कठिन सिद्ध होगी नगर निगम पहुंचने की डगर

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नगर निगम चुनाव और भाजपा
गलत फहमी के शिकार जो नेता कभी चुनाव नहीं जीत पाए टिकट वितरण में उनकी भूमिका प्रत्याशियों के लिये!

मेरठ 7 नवंबर। नगर निगम चुनाव में भाजपा के पार्षद और मेयरपद के उम्मीदवारों द्वारा पूरे जोश खरोश के साथ नामांकन तो कर दिया गया। इस दौरान अंतिम दिन उम्मीदवारों और उन्हे टिकट दिलाने वाले आकाओं ने अपनी तरफ से पूरी ताकत शक्ति प्रदर्शन में सफलता दर्शाने के लिये लगा दी।
लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या चुनाव के अंतिम समय मतदान तक भाजपा के वरिष्ठ नेता और उम्मीदवार इस जोश अपने समर्थकों में बनाए रखेंगे। और अपने कार्यकर्ताओं को जो फिलहाल खफा है उन्हे जोड़ पाने में तथा विद्रोह को समाप्त करने में सफल हो पाएंगें तो फिलहाल तो यह लगता है कि भाजपा उम्मीदवारों के लिये बहुत कठिन डगर सिद्ध होगी। चुनाव में नगर निगम तक पहुंचने की।
फिलहाल वरिष्ठ भाजपा नेता और निकाय चुनावों एवं नगर निगम की राजनीति के भाजपा में चाणक्य समझे जाने वाले पूर्व पार्षद एवं स्थानीय निकायों में पूर्व में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने तथा महानगर में खासकर नगर निगम क्षेत्र में पोलिंग एजेंट बनाने में अग्रणी अजय गुप्ता नाॅमिनेशन तक तो सक्रियता से दूर रहे क्योंकि उनके खुद के वार्ड में उम्मीदवार चुनते हुए शायद उनसे सलाह नहीं ली गई। इसलिये वह और भी ज्यादा नाराज बताए जाते हैं।

दूसरी तरफ महापौर पद पर कई वाल्मीकि उम्मीदवार चुनावी मैदान में है। और अपने वर्ग को रिझाने ओर अपने पक्ष में मतदान कराने के लिये ऐढ़ी से चोटी तक का जोर लगाएंगे। उसके बावजूद भाजपा हाईकमान द्वारा इस चुनाव में अभी तक उत्तर प्रदेश सरकार में निकाय राज्यमंत्री रहे रामचंद वाल्मीकि को पूरी तौर पर नजर अंदाज किया गया लगता है क्योंकि वो कहीं भी चुनावी समर में नाॅमिनेशन तक दिखाई नहीं दिये। जबकि वो समाज के अन्य क्षेत्रों में काफी सक्रिय हैं।
बताते चले कि भाजपा की मेयर रही और अपने कार्यकाल में सफलता के झंडे गाड़ने में सफल मेरठ की पहली महिला मेयर मधु गुर्जर के कार्यकाल और उनकी कार्यप्रणाली को निगम क्षेत्र के निवासी आज भी नहीं भूलें। उसके बावजूद क्या कारण रहे कि मधु गुर्जर और पूर्व मेयर सुशील गुर्जर दोनों ही चुनाव के प्रथम चरण नामांकन के दौरान कहीं नजर नहीं आए।
अंदर की बात तो नहीं पता लेकिन वैश्य समाज और व्यापारी वर्ग सहित नगर में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान और लगभग सभी मतदाताओं पर कम या ज्यादा अपनी पकड़ बनाए रखने वाले विनित शारदा अग्रवाल जो हमेशा हर समय हर क्षेत्र में सक्रिय नजर आते हैं और भाजपा के संघर्षशील नेताओं में गिने जाते हैं। वो और कुछ माह पहले शहर में लगभग 1 हजार युवाओं के साथ जुलूस निकालकर भाजपा की शाक्ति और समर्थन का अहसास करा चुके कमल दत्त शर्मा आदि ऐसे नेता जो पूरी ताकत लगाकर चुनावों में पाटी्र उम्मीदवारों के समर्थन में हमेशा कार्य करते नजर आते थे इस बार नामांकन तक कहीं दिखाई नहीं दिये। जिसे देखकर शहर में चर्चा है कि यह चुनाव भाजपा के पार्षदों और महापौर पद के उम्मीदवारों के लिये बड़ा कठिन साबित हो सकता।
यह तो ऐसे नाम है जो चर्चाओं में रहते हैं लेकिन जहां तक सुनाई दे रहा है टिकटों के वितरण को लेकर भाजपा में अन्य दलों के मुकाबले ज्यादा बड़ा अंसतोष है। जिसके चलते पार्टी नेताओं के घेराव तो हो ही रहे हैं कुछ लोग गंभीर आरोप लगाने में भी नेताओं पर पीछे नहीं है।
कई वार्डाें में पार्षद पद पर भाजपा के विद्रोही जैसे रविंद्र तेवतिया आदि द्वारा नामांकन किया गया है। ऐसे में चुनाव परिणाम क्या होंगे यह तो बाद की बात है लेकिन फिलहाल तो यह कहा जा सकता है कि टिकट वितरण को लेकर जुड़े रहे नेता और हाईकमान द्वारा कुछ गलत फहमी शायद पाली हुई और कुछ नेताओं को लगता है कि वो अपने दम पर चुनाव जीत सकते हैं जबकि सही मायनों में तो कहीं नेता तो जो टिकट वितरण में सर्वे सर्वा थे उनमे से कुछ तो आज तक जनता के बीच जाकर चुनाव जीत नहीं पाए और अगर लड़ा तो पराजय का मुंह देखकर बैठ गए। समय अभी दूर हैं देखिए आगे आगे अभी होता है क्या। – संवाद सूत्रों व जन चर्चाओं पर आधारित

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