विकास भवन में हुआ ग्लैंण्डर्स एवं फारसी रोग की रोकथाम एवं नियन्त्रण हेतु कार्यषाला का आयोजन कार्यशाला में विशेषज्ञों ने दिये ग्लैंण्डर्स एवं फारसी रोग की रोकथाम हेतु अपने अपने सुझाव

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मेरठ : विकास भवन मेरठ के सभागार में आज ग्लैंण्डर्स एवं फारसी रोग की रोकथाम एवं नियन्त्रण हेतु एक दिवसीय कार्यषाला का शुभारम्भ मुख्य पषु चिकित्साधिकारी मेरठ डा0ए0के0 सिंह द्वारा दीप प्रज्जवलित कर किया गया। इस अवसर पर मारकण्ड सिंह, मैनेजर ब्रूक्स इण्डिया द्वारा ग्लैण्डर्स बीमारी के इतिहास पर प्रकाष डालते हुये अवगत कराया कि क्षेत्र में अष्व पालकों के द्वार पर चिकित्सा आदि सुविधाऐं ब्रूक्स इण्डिया द्वारा प्रदान की जाती हैं जिसमें क्षेत्रीय पषु चिकित्साधिकारियों, पषुधन प्रसार अधिकारियों के सहयोग से कार्य करते हैं। अष्व पालकों को अष्वों की विभिन्न बीमारियों से बचाव करने के लिये आवष्यक जानकारी देते हैं।

कार्यशाला में डा0 राजन ने बताया कि ग्लैण्डर्स एवं फारसी एक जुनोटिक बीमारी है जो अष्व से मनुश्य में फैलती है, जो एक बैक्टीरिया बरखौडिया मैलियाई द्वारा होती है। इस बीमारी का कोई सफल इलाज नहीं है। यह बीमारी छुआछूत से फैलती है। गधे एवं खच्चर में एक्युट रूप में होती है तथा घोडों में क्रोनिक रूप में होती है। यह बीमारी क्यूटेनियस पल्मोनरी एवं नेजल रूप में होती है। क्यूटेनियस रूप में अष्व के शरीर में गांठे पड जाती हैं जो धीरे-धीरे बढकर पूरे शरीर में फैल जाती हैं बाद में गांठे फूट जाती हैं। पल्मोनरी रूप में शुरूआत में नाक से स्त्राव आता है बाद में यह स्त्राव म्यूकोपुरूलेन्ट हो जाता है। नर पषु में अण्डकोष में सूजन आ जाती है। घोडों में लगातार आंसु चलते रहते हैं। इस बीमारी के सीरो सर्विलान्स के लिये सीरम नमूने लिये जाते हैं जिनको कोल्डचैन में राष्ट्रीय अष्व अनुसंधान केन्द्र हिसार को भेजा जाता है, वहां से धनात्मक नमूने की पुष्टि होने पर ग्लैण्डर्स एवं फारसी रोग की पुष्टि हो जाती है।

ईपीडीमोलोजिस्ट डा0 अर्चना ने बताया कि कि यह ग्लैण्डर्स एवं फारसी रोग अष्व से मनुष्य में कैसे फैलता है। मनुष्य में इस बीमारी का इंक्यूवेषन काल 01 से 14 दिन एक्यूेट रूप में तथा 12 सप्ताह क्रोनिक रूप में होता है। मनुष्य में यह बीमारी पषु चिकित्साविदों एवं अष्व पालकों को सम्भावना अधिक रहती है। मनुष्यों में भी इस बीमारी के तीनों रूप मिलते हैं। डा0 इन्द्रजीत सिंह, प0चि0अ0 फलावदा द्वारा इस बीमारी के बारे में विस्तार से बताया तथा यह कीटाणु 24 घण्टे धूप में रहने के बाद भी नहीं मरता है, केवल निष्क्रिय हो जाता है। बहते पानी में एक माह तक जिन्दा रह सकता है। पोटेषियम परमेगनेट, हाइपोक्लोराइड एवं ईथेनाॅल आदि के प्रति संवेदनषील होता है। घोडों के अलावा बिल्ली एवं उसकी प्रजाति मांसाहारी पषुओं में भी यह रोग पाया जाता है। प्रथम एवं द्वितीय विष्वयुद्ध में ग्लैण्डर्स का कीटाणु जैविक हथियार के रूप में प्रयोग किया गया। यह बीमारी ब्राजील, चीन, मंगोलिया, टर्की, संयुक्त अरब अमीरात, एषिया, अफ्रीका आदि जगह में पायी जाती है। इस रोग के उपचार के लिये एंटीबायोटिक दवाऐं जैसे डोक्सीसाईक्लीन, जेन्टामाईसीन आदि प्रयोग की जाती है परन्तु पूरी तरीके से कोई भी एंटीबायोटिक रोग को ठीक नहीं करती।

इस बीमारी से रोकथाम के लिये कोई कारगर वैक्सीन उपलब्ध नहीं है फिर भी अमेरिका एवं फ्रान्स में स्टड फार्म में वैक्सीन का प्रयोग किया जाता है, जिसकी क्षमता 60प्रतिषत है। डा0वाई0पी0एस0 नायक अपर निदेषक द्वारा अवगत कराया गया कि आज की कार्यषाला विभाग एवं अन्य विभागों के लिये अच्छी मार्गदर्षक रही, जिसमें ग्लैण्डर्स एवं फारसी रोग के बारे में समस्त जानकारी मिली।
कार्यषाला के अन्त में डा0नायक, डा0प्रमोद कुमार, डा0भूदेव सिंह, ब्रूक इण्डिया, ए0सी0एम0ओ0, इपिडिमोलोजिस्ट, समस्त पषु चिकित्साविदों, पषुधन प्रसार अधिकारियों तथा वेटेनरी फार्मासिस्ट का धन्यवाद किया गया साथ में बायो सिक्योरिटी पर विषेष ध्यान देने हेतु आग्रह किया गया।

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