सेना से क्यों बार-बार निकलते जयचंद ,चल दो सेना के जयचंदों को :आर.के. सिन्हा

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वैज्ञानिक निशांत अग्रवाल के पाकिस्तान को ब्रह्मोस मिसाइल की जानकारी लीक करने का मामला प्रकाश में आने से देश स्तब्ध है। ये मामला सिद्ध कर रहा है कि हमारे देश में अब भी जयचंद जैसे आस्तीन के सांप मौजूद हैं। इस मामले पर अभी हाय-तौबा मचाने वाले सांबा जासूसी केस को क्यों भूल रहे हैं? सांबा केस सन 1980 में हुआ था। उसमें सेना की 168 ब्रिगेड के लगभग 50 जवानों को पकड़ा गया था। उन पर पाकिस्तान के लिए जासूसी करने का आरोप था। इसी के साथ यह भी मत भूलिए80 के दशक के लारकिंस जासूस केस को भी। तब मेजर जनरल फ्रेंक लारकिंस, उनके भाई एयर मार्शल कैनिथ लारकिंस और लेफ्टिनेंट कर्नल जसबीर सिंह को देश के बेहद संवेदनशील रक्षा दस्तावेजों की पाकिस्तानी जासूसों के हाथ सप्लाई करते हुए रंगे हाथ पकड़ा गया था। इन तीनों पर लगे आरोप साबित हुए थे।

डूब के मरें ये गद्दार!

दरअसल देश के साथ गद्दारी करने वालों इन दुष्टों को चुल्लू भर पानी में डूब के मर जाना चाहिए। ये अपनी भारत माता के साथ धोखा कर रहे हैं। जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद कर रहे हैं I ये उन हजारों रणभूमि के बांकुरे वीरों की शहादत का अपमान करते हैं, जिन्होंने रणभूमि में दुश्मनों के दांत खट्टे किए हैं । ये अपमान करते हैं मेजर आशा राम त्यागी, फ्लाइंग आफिसर निर्मलजीत सिंह सेंखों, कैप्टन सौरभ कालिया, हवलदार अब्दुल हामिद, मेजर अश्वनी कान्वा जैसे हजारों योद्दाओं का जिन्होंने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी है। क्या देश के साथ गद्दारी करते हुए इन्हें एक पल के भी यह ख्याल नहीं आता कि सारा देश इन शहीदों और तमाम रणभूमि के वीरों को अपना नायक मानता है? इन सब की स्मृति को चिर ऱखने के लिए राजधानी के इंडिया गेट में प्रधानमंत्री मोदी एक भव्य राष्ट्रीय युद्ध स्मारक भी बनवा रहे हैं। यह इस बात की गवाही है कि देश के लिए कितने आदरणीय हैं ये सारे रण बाँकुरे योद्धा। ये आदरणीय इसलिए हुए क्योंकि इनमें से किसी नेकभी देश को बेचा नहीं। सोचा तक नहीं!

सेना के किसी भी अधिकारी का शत्रु को अहम खुफिया जानकारी देने में फंसे शख्स की सिर्फ एक ही सजा हो सकती है। वो है सजा-ए-मौत है। इससे कम का तो कोई सवाल ही नहीं है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के लिए जासूसी करने वाला निशांत अग्रवाल का मामला बेहद सनसनीखेज है। वो ब्राह्मोस मिसाइल के सीक्रेट्स आईएसआई को बेच रहा था। यह शख्स रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले डीआरडीओ में वैज्ञानिक था। इसे 2017 में यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड तक मिल चुका था। यानी जब यह देश का डिफेंस सीक्रेट बेच रहा था, उसी दौरान इसे देश में अवॉर्ड भी दिया जा रहा था। यानी चूक तो कई स्तरों पर हुई है। इस मामले की गहन पड़ताल होनी चाहिए और ऐसे सभी गद्दारों का पर्दाफाश हो। अगर मंयक अग्रवाल के साथ उनके कुछ और साथी भी फंसे हैं, तो उन्हें भी जेल में सड़ने के लिए भेज देना चाहिए। अंडमन निकोबार के कालापानी ही इनके लिए उपयुक्त जगह होगी। इस तरह के मामलों में किसी तरह की रियायत या नरमी तो कतई नहीं बरती जानी चाहिए। निस्संदेह सेना की जासूसी करना अक्षम्य अपराध की श्रेणी में आता है। उसे कठोरतम सजा मिलनी ही चाहिए। इन जयचंदों को देश स्वीकार कभी भी नहीं कर सकता। ऐसे मामलों को राष्ट्रद्रोह नहीं मानेंगें तो और किसे मानेंगे । वे जिस देश का अन्न खा रहे हैं, जिस सरकार के वेतनभोगी हैं, उसी की पीठ में छुरा भोंक रहे हैं। महात्मा गांधी कहते थे “हमारी धरती के पास प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता पूरी के लिए तो बहुत कुछ है, पर किसी के लालच को पूरा करने के लिए कुछ भी नहीं”।

निशांत अग्रवाल या इससे पहले सुरक्षा एजेंसियों की जाल में फंसे जासूसों से पूछा जाना चाहिए कि आखिर ये किस लालच में आकर भारत माता के साथ धोखा करने लगे? आखिर भारत सरकार की स्थायी नौकरी इन्हें क्या नहीं देती थी। मोटी पगार, घर,पेंशन और दूसरी तमाम सुविधाओं के बाद भी अगर कोई असंतुष्ट है, तब उसका तो कोई इलाज नहीं कर सकता।

क्यों पैदा होते निशांत अग्रवाल?

सेना के तीन अंगों और देश के रक्षा क्षेत्र से जुड़े संस्थानों के आला अफसरों को भी इस सवाल का जवाब देना पड़ेगा कि उनके यहां निशांत अग्रवाल जैसे अफसर आख़िरकार कैसे पैदा हो जाते हैं? कमी किस स्तर पर है? यहां पर मसला सिर्फ एक निशांत का नहीं है। जिस तरह से सेना के जासूसों की गिरफ्तारी की खबरें आती रहती हैं, उससे तो यही लगता है कि सेना में जासूसी करने वालों ने अपने पैर पसार रखे हैं। इनके लिए पैसा कमाना देश सेवा से कहीं अधिक अहमियत रखता है।निशांत जैसों के अफसर यह जवाब दें कि उन्हें ये पता क्यों नहीं चल पाता कि उनके ही महकमें में कुछ आस्तीन के सांप पल रहे हैं? जाहिर है, इन सवालों के जवाब तो उन्हें ही देने होंगे। यह सवाल देश पूछ रहा है और उनके अपने दोस्त मित्र और रिश्तेदार भी पूछ ही रहे होंगें।

दरअसल, हमारे दो पड़ोसी पाकिस्तान और चीन,जो घनघोर शत्रु भी हैं, हमें सदैव कमजोर होते देखना चाहते हैं। वे दूर-दूर तक यह नहीं चाहते कि भारत एक विश्व शक्ति बने। हालांकि उनके न चाहने के बाद भी हम संसार की सैन्य और आर्थिक शक्ति बन चुके हैं। हमें इन दोनों से बार-बार बिना वजह उलझना पड़ता है। हम इन दोनों देशों से कई बार युद्ध के मैदान में भी दो-दो हाथ करके इन्हें जन्नत की हकीकत दिखा चुके हैं। पर ये दोनों ही हमारी सेना में सेंध लगाने की लगातार जी तोड़ कोशिश करते रहते हैं। आपको याद ही होगा भारत को चीन से डोकलम में करीब तीन माह तक लोहा लेना पड़ा था। जंग के हालत तक बन चुके थे। पर चीन ने अंततः अपने कदम पीछे खींच लिए। उसे पता था कि इस बार युद्ध हुआ तो भारत उसके गले में अंगूठा डाल देगा। अब अपना भारत 1962 वाला नहीं रहा है। डोकलम के बाद पाकिस्तानी घुसपैठिये भी बार-बार भारत में घुसपैठ की कोशिशें करते रहे। पाकिस्तान तो बेशर्म मुल्क है। लगता है कि 1948, 1965, 1971 और कारगिल की हार को भूल गया है। वह फिऱ से एक मार ढूँढ रहा है। पर इन सब बातों के बावजूद यह तो मानना ही होगा कि उसका काफी काम हमारे निशांत अग्रवाल जैसे जयचंद कर देते हैं। अब हमें कई स्तरों पर सक्रिय होना पड़ेगा। पहला, अपने जासूसों को कड़ी से कड़ी सजा देना। दूसरा, सेना में व्याप्त गड़बड़ियों को दूर करना। दुर्भाग्यवश मुझे यह कहना पड़ रहा है कि सेना के भीतर भी कई स्तरों पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। सेना का एक छोटा सा वर्ग अपने लालच के कारण सेना की महान उजली छवि पर दाग लगा रहा है। यहां पर सिर्फ आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाले का उल्लेख करना ही काफी होगा।

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