क्या रालोद मुटठीभर नेताओं के दम पर जीत पाएगा मेयर का चुनाव?

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मेरठ 9 नवंबर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 8 नवंबर 2016 को रात आठ बजे देश के नाम संदेश में 1000 व 500 के नोट बंद करने की की गई घोषणा के एक साल बाद 8 नवंबर 2017 को कांग्रेस व अन्य दलों के साथ ही रालोद द्वारा भी गत बुधवार को नोटबंदी के एक वर्ष पूरा होने पर काला दिवस मनाया गया जिसके तहत रालोद ने भी कमिश्नरी चैराहे पर धरना-प्रदर्शन किया। इन कार्यकर्ताओं का कहना था कि नोटंबदी के फैसले का खामियाजा जनता को मुसीबत ङोलकर उठाना पड़ रहा है रालोद के पदाधिकारी और कार्यकर्ता चैधरी चरण सिंह पार्क कश्मिनरी में एकत्र हुए। इसके बाद नारेबाजी करते वह मंडलायुक्त गेट पर पहुंचे और वहां धरना-प्रदर्शन किया। काली पट्टा व काली स्लोगन तख्ती लेकर उन्होंने नोटबंदी के खिलाफ गुस्से का इजहार किया। इस दौरान जिलाध्यक्ष राहुल देव ने कहा कि नोटबंदी जैसी दुनिया की सबसे बड़ी वैधानिक लूट पर सरकार द्वारा जश्न मनाने के विरोध में राष्ट्रीय लोक दल प्रदेश व्यापी काला दिवस मना रहा है। इसी क्रम में हम यहां एकत्रित हुए हैं। एक वर्ष पूर्व नोटबंदी के फैसले से 150 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। चार करोड़ से अधिक लोगों का रोजगार छिन गया। राष्ट्रीय लोक दल कड़ी निंदा व विरोध करता है। प्रदेश सरकार में सिंचाई मंत्री रहे
रालोद के राष्ट्रीय महासचिव डाॅ. मैराजुद्दीन, किसान प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष चै. राममेहर सिंह गुर्जर, सैनिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष कर्नल ब्रह्मपाल तोमर, राजेन्द्र चिकारा, डाॅ. राजकुमार सांगवान, सुनील रोहटा, विकास सिंह, रणवीर दहिया, पप्पू गुर्जर, भोपाल सिंह, पूर्व विधायक डाॅ परवेज हलीम, नरेन्द्र खजूरी, डाॅ सुशील कुमार,अनिल चैधरी आदि मौजूद रहे। इस दौरान
कमिश्नरी पार्क के आसपास से होकर गुजरने वाले कुछ नागरिकों का रालोद के धरने को देखकर कहना था कि राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय और एक समय केंद्र व प्रदेश में सरकार बनाने में महत्वपूर्ण सहयोग देने वाले रालोद ने मेयर पद पर अपना उम्मीदवार संगीता रानी के रूप में उतार दिया। कई वार्डाें में पार्षद उम्मीदवार भी उतारे गए हैं लेकिन किसी विशेष मुददे पर तो होने वाली मीटिंगों में कुछ लोग एकत्रित हो जाते हैं बाकि जब जब रालोद द्वारा कोई धरना या प्रदर्शन किया जाता है उनमे हमेशा यही लोग दिखाई देते हैं। क्या जिले में लोकदल के पास यह नेता ही नेता है कार्यकर्ता नहीं। क्या ऐसे प्रदर्शन और इतने कार्यकर्ताओं के दम पर ही रालोद मेयर का चुनाव जीतने का दावा कर रहा है तो दूसरे का कहना था कि भाई लगता तो नहीं। हां यह है कि ग्रामीण कहावत मेरे मिया के तीन यार। धुने जुलाहे और मनीहार की कहावत के समान । उंगुलियों पर गिने जाने वाले यही नेता रालोद के हमेशा नजर आते हैं। ऐसे में तो अच्छा था कि अगर किसी विपक्षी दल से मिलकर महापौर का चुनाव रालोद लड़ता तो उसके उम्मीदवार की स्थिति काफी अच्छी होती और प्राचार भी अच्छा हो सकता था। तथा बाकी तो नामांकन के दौरान ही स्पष्ट हो रहा था कि जो लोग एक मजबूत उम्मीदवार नामांकन के कुछ घंटे तक पहले तैेयार नहीं कर पाए और जल्दबाजी में बसपा छोड़कर आए डा सुशील की पत्नी का नामांकन कराना पड़ा। ऐसे में भविष्य क्या होगा यह तो भगवान ही जान सकते हैं।

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