मेरठ 20 फरवरी (प्र)। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय की प्राइवेट परीक्षा व्यवस्था के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका स्वीकार कर ली गई है। विश्वविद्यालय की व्यवस्था को छात्रों के साथ धोखा बताते हुए इसे बंद करने की मांग करने वाले निजी कालेजों के संगठन ने विश्वविद्यालय स्तर पर सुनवाई न होने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
याचिका पर एडवोकेट नितिन यादव ने बताया कि प्राइवेट व्यवस्था से विद्यार्थियों के पंजीकरण व परीक्षा की अनुमति देना मनमाना, अवैध और उच्च शिक्षा को शासित करने वाले वैज्ञानिक प्रविधानों के प्रतिकूल है। प्राइवेट माध्यम में परीक्षा जारी रखना उच्च शिक्षा के विनियामक ढाचे के विपरीत है, जिसमें केवल नियमित आनलाइन व मुक्त व दूरस्थ शिक्षा (ओडीएल) माध्यमों को ही मान्यता प्राप्त है। केवल परीक्षा में सम्मिलित होकर बिना संरचित अध्ययन व मूल्यांकन के उपाधि प्राप्त करने के लिए किसी स्वतंत्र निजी माध्यम को कोई मान्यता नहीं है। कहा कि विश्वविद्यालय का यह विवादित निर्णय उपाधि प्रदान करने के लिए न्यूनतम शिक्षण व मूल्यांकन मानकों को बनाए रखने के उद्देश्य को विफल करता है। इससे शैक्षणिक मानकों का क्षरण होता है और प्रदत्त उपाधियों की गुणवत्ता संदेहास्पद हो जाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के लागू होने के बाद शैक्षणिक ढांचा सतत व समग्र मूल्यांकन, सेमेस्टर आधारित आकलन, क्रेडिट फ्रेमवर्क, अनिवार्य उपस्थिति व ग्रेडेड प्रदर्शन की अपेक्षा करता है। यह प्राइवेट माध्यम में असंभव है। इसमें न तो शिक्षण होता है और न ही आंतरिक मूल्यांकन |
एड. नितिन यादव ने कहा कि विश्वविद्यालय में जब दूरस्थ शिक्षा माध्यम से शिक्षा प्रदान करने के लिए एक व्यवस्था व समर्पित मुक्त विश्वविद्यालय पहले से है, तब परंपरागत विश्वविद्यालयों की ओर से प्राइवेट परीक्षा जारी रखना अनावश्यक, दोहरावपूर्ण व मानकों के क्षरण का कारण है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अपनाने व संशोधित शैक्षणिक संरचनाएं लागू के बाद कई अन्य राज्य विश्वविद्यालयों ने प्राइवेट परीक्षाएं बंद कर दी हैं। बावजूद इसके सीसीएसयू इस पुरानी व्यवस्था को जारी रखे हुए है।
याचिका में तर्क दिया है कि प्राइवेट माध्यम की निरंतरता से असमान व अन्यायपूर्ण शैक्षणिक वातावरण उत्पन्न होता है। इसमें बिना अकादमिक सहभागिता के उपाधि प्राप्त करने वाले छात्र, नियमित आनलाइन व ओडीएल माध्यम से कठोर शिक्षण व मूल्यांकन से गुजरने वाले छात्रों से प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे मेधावी छात्रों को क्षति होती है। विश्वविद्यालय का ग्रामीण छात्रों को लाभ देने का कथन वैधानिक शैक्षणिक मानकों को निरस्त नहीं कर सकता। बिना अकादमिक सहभागिता के सीधे परीक्षा में निजी परीक्षार्थियों को अनुमति देना संस्थागत जवाबदेही को कमजोर करता है और परीक्षा की पवित्रता व अखंडता से समझौता करता है।
