पिछले वर्ष 25 विकसित देशों ने विकसित देशों को दी जाने वाली विकास सहायता में कटौती की इस पर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में आगाह करते हुए चिंता व्यक्त की गयी है। इससे संबंध एक खबर के अनुसार दुनिया के समृद्ध और निर्धन देशों के बीच आर्थिक खाई कम होने की जगह और अधिक गहरी होती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल दुनिया के 25 विकसित देशों ने गरीब राष्ट्रों को दी जाने वाली सहायता में भारी कटौती की है। इससे 2024 की तुलना में 23 फीसदी की गिरावट आई है।
रिपोर्ट में कहा गया कि वैश्विक वित्तीय संस्थानों में बड़े सुधार समेत जिन ऐतिहासिक फैसलों पर पिछले साल स्पेन में सहमति बनी थी, उनके पूरा नहीं होने से यह समस्या बढ़ गई है। रिपोर्ट में जून, 2025 में स्पेन के सेविले में अपनाए गए मापदंडों का आकलन किया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया कि शीर्ष पांच बड़े कटौती करने वाले देश 96 फीसदी गिरावट के लिए जिम्मेदार हैं। इसमें सहायता में सबसे बड़ी कटौती अमेरिका ने की है, जो करीब 59 फीसदी रहा। अनुमान है कि इस साल 5.8 फीसदी की और गिरावट आएगी। वहीं गरीब देशों से होने वाले निर्यात पर औसत टैरिफ 2025 में 9 प्रतिशत से बढ़कर 28 फीसदी हो गया है। इसका विकासशील देशों पर बहुत बुरा असर पड़ा है। अफ्रीकी देशों को मिलने वाली सहायता में 26.3 फीसदी की कमी आई है। सबसे कम विकसित देश में 25.8 प्रतिशत की गिरावट है। वैश्विक स्तर पर कुल 35.8 फीसदी की गिरावट आई है, जो स्वास्थ्य और आपदा राहत के लिए बड़ा खतरा है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट वाकई में सोच के योग्य है क्योंकि काफी गरीब देश अब अपने दम पर भी तरक्की कर रहे हैं और समाजहित में उनकी सोच में भी सुधार आ रहा है और नई पीढ़ी हर मामले में जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे बढ़कर कोशिश कर रही है फिर भी अमीर गरीब देशों बढ़ती खाई के साथ ही आम आदमी में भी यह स्थिति दिखाई दे रही है और अब तो ऐसे में जब जाति व्यवस्था को उभारकर आगे बढ़ने का प्रयास करने वालांे की समाज को मजबूती देने के नाम पर संख्या बढ़ रही है ऐसे में भी अब कुछ नागरिक कहने लगे हैं कि अब सिर्फ दो ही जातियां है अमीर औरगरीब ना इनमें कोई बड़ा है ना कोई ऊंचा-नीचा यह सब एक हैं कहते है कि जिस प्रकार से अनेकों रंग होने के बावजूद भी काला और सफेद रंग का प्रभाव अलग ही है उसी प्रकार अमीर-गरीब आपस में बंटते जा रहे हैं जब कुछ लोगों को इनकी आवश्यकता होती है तो वह उनके नाम पर दुकान चलाने की कोशिश करते हैं और समस्याओं का मारा गरीब और अमीर दोनों ही इनके जाल में फंसते चले जाते हैं और जब वक्त निकल जाता है तो पता चलता है कि इनका तो इस्तेमाल कर लिया गया है आपस में लड़ाकर।
इसका जीता जागता प्रमाण वर्तमान में पढ़े लिखे नौजवान युवक-युवतियों द्वारा किये जा रहे अंतराजतीय विवाहों को देख सकते हैं क्योंकि कहीं दहेज तो कभी जाति का जोड़ा ना मिलने से कुछ युवक युवतियों की शादी की उम्र निकल जाती है इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अब समझदार नौजवान पढ़ाई और काम के दौरान ही अपना साथी ढंूढ लेते है और विवाह करके या लिव इन रिलेशन में रहकर जीवन को आगे बढ़ाते है।
मेरा मानना है कि लिव इन रिलेशन में रहने की बजाये अगर अपनी मर्जी से हमारी युवा पीढ़ी सोच समझकर शादी करती है तो वह कई प्रकार से समाज के लिए भी सही है क्योंकि एक तो दहेज की व्यवस्था नहीं करनी पड़ती दूसरे लड़का हो या लड़की मां-बापों को यह दोष नहीं देता कि मेरी शादी गलत व्यक्ति से कर दी गयी। कुल मिलाकर यह कह सकता हूं कि गरीब देशों की आर्थिक स्थिति सुधारने के साथ ही गरीब और अमीर की जो खाई समाज में बढ़ रही है उसे मैं संतुलन बनाने का काम हम सब को मिलकर सरकार के साथ करना चाहिए। अमीर को तो गरीब नहीं किया जा सकता लेकिन इस प्रयास के तहत गरीब को सरकारी साधनों का लाभ उठाकर अपनी काबिलियत के दम पर आगे बढ़ने और आर्थिक रूप से मजबूत करने के मौके बेहिसाब है अगर काम करने के बजाये मेरे पास साधन नहीं है सुविधा नहीं है सोर्स नहीं है मैं कैसे आगे बढूं की सोच को त्याग दिया जाये तो भले ही गरीब बहुत रईश ना बन पाये मगर अपना और अपने बच्चों का सही तरीके से पालन पोषण करते हुए समाज में सिर उठाकर तो चलेगा ही गरीब अमीर की खाई पाटने का भी माहौल बनेगा।
प्रस्तुतिः- अंकित बिश्नोई राष्ट्रीय महामंत्री सोशल मीडिया एसोसिएशन एसएमए पूर्व सदस्य मजीठिया बोर्ड यूपी संपादक पत्रकार
समाज में दो ही जाति हैं! गरीब अमीर देशों में ही नहीं आर्थिक रूप से कमजोरों के बीच भी बढ़ रही है खाई, अंतरजातिया विवाह और लघु उद्योग लगाने से?
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