Friday, April 19

अतुल प्रधान के खिलाफ कार्रवाई ठीक नहीं, नर्सिंग होम एसोसिएशन बंदी की बात ना करें, उच्चाधिकारी जनप्रतिनिधियों के साथ विचार कर मामला निपटाएं

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सरधना से सपा विधायक अतुल प्रधान और गढ़़ रोड स्थित न्यूटिमा अस्पताल के प्रबंधकों के बीच जारी विवाद गहराता ही जा रहा है। एक तरफ अतुल प्रधान के समर्थन मे छात्र और विपक्षी दलों के नेताओं व आम आदमी भी जुड़ते जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर न्यूटीमा के साथ नर्सिंग होम एसोसिएशन खड़ी हो गई है। विधायक अतुल प्रधान का कहना है कि वो जनता को न्याय दिलाने और अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई के लिए अनशन के अनशन करेंगे तो समर्थक कह रहे हैं कि हम आत्मदाह तक कर लेंगे। दूसरी तरफ नर्सिंग एसोसिएशन का कहना है कि कार्रवाई नहीं हुई तो डॉक्टर चिकित्सीय कार्य बंद कर देंगे और ओपीडी नहीं चलेगी। अतुल प्रधान का कहना है कि मेरी लड़ाई इन अस्पतालों में हो रही लूट के खिलाफ है। तो न्यूटिमा अस्पताल के संचालकों का कहना है कि अतुल प्रधान बिना भुगतान कराए ही मरीजों को ले जाते हैं। सही स्थिति तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है। लेकिन पाठकों में जो मौखिक चर्चा है उसके अनुसार अतुल प्रधान छात्र जीवन से ही संघर्षशील रहे हैं और जनमानस की समस्याओं के समाधान के लिए उनके द्वारा हमेशा प्रयास किए जाते रहे हैं। इसलिए न्यूटिमा प्रकरण में भी उनका पक्ष सही है। जहां तक नयूटिमा और उसके प्रबंधकों की बात है तो जितना इसके शुरू होने के बाद से अब तक पढ़ने सुनने देखने को मिला उससे तो यह स्पष्ट होता है कि इनके यहां तो कोई ना कोई विवाद होता ही रहता है। इस जुबानी जंग के बीच न्यूटिमा के लैब टैक्नीशियन जानी के ग्राम ढडरा निवासी आसिफ पुत्र मौसम अली का कहना है कि अस्पताल के मालिक संदीप और श्वेता गर्ग पिछले कोविड काल के बाद से ही मुझ पर नमूना जांच में हेरा फेरी करने का दबाव डाल रहे थे। पिछले एक सप्ताह से अपशब्द कहकर बात करते थे। उन्हीं की शह पर कर्मचारी अंशुल कार्तिक और शुभम ने उन पर हमला किया। लैब टैक्नीशियन के हवाले से छपी खबर में कहा गया है कि डॉ. अमित उपाध्याय, डॉ राजीव रस्तौगी विश्वजीत बैंबी से मारपीट की शिकायत की लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा और यह तमाशबीन बने रहे। दूसरी तरफ सीएमओ अखिलेश मोहन ने अस्पताल में बाउंसर रखने को गैर कानूनी बताते हुए सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया है। तो जिलाधिकारी दीपक मीणा द्वारा इस प्रकरण में कमेटी बनाई गई। जो भी हो अभी तक मेडा द्वारा दिए गए नोटिस पर कोई ठोस कार्रवाई नर्सिंग होम के खिलाफ ना करना और मेडा वीसी का कथन कि अस्पताल शमन कराए समझ से बाहर है। क्योंकि जितने अवैध निर्माणों पर इस पर आरोप लगते रहे हैं उससे यहां शमन होने की स्थिति नहीं है। अवैध निर्माण तुड़वाया ही जाना चाहिए और मरीजों से यहां के प्रबंधकों द्वारा की जाने वाले दुव्यर्वहार पर रोक लगनी चाहिए।
नर्सिंग होम एसोसिएशन के कथन कि चिकित्सीय कार्य और ओपीडी कार्य बंद करेंगे पर नागरिकों का कहना है कि यह सब दबाव बनाने के लिए है क्योंकि जांच कराई जाएगी तो 90 प्रतिशत नर्सिंग होम और डाक्टरों के क्लीनिक अवैध रूप से निर्मित और शासन की निर्माण नीति के विपरित बने हुए हैं। न्यूटिमा के खिलाफ कार्रवाई होती है तो इनका भी नंबर आ सकता है। कई ने कृषि भूमि पर बना रखे हैं तो कई ने रिहायशी भूमि पर अस्पताल बना रखे है। इस कार्रवाई से बचने के लिए इनके द्वारा यह सब किया जा रहा है।
मेरा मानना है कि विधायक अतुल प्रधान के आरोपों की जांच एक उच्चस्तरीय कमेटी से कराई जाए लेकिन न्यूटिमा प्रबंधकों के बारे में जो आम आदमी की राय है उसके अनुसार इनकी जांच भी कराई जाए। नागरिकों का कहना है कि अगर अतुल प्रधान को दबाव में लेने या उन्हें पीड़ित करने की कोशिश हुई तो आम आदमी इस संदर्भ में उनके समर्थन में खड़ा हो सकता है। जागरूक नागरिकों का यह भी मत है कि हर नर्सिंग होम में एक चार्ट लगवाया जाए जिस पर कौन डॉक्टर कितनी फीस लेगा और ऑपरेशन पर कितना खर्चा आएगा और अस्पतालों में मेडिकल स्टोर बंद कराए जाए और पार्किग में जो निर्माण किया गया है उसे हटवाया जाए। जहां तक न्यूटिमा प्रबंधन का आरोप है कि अतुल प्रधान बिना भुगतान कराए मरीजों को ले जाते हैं तो ऐसे मरीजों की सूची जारी करे और इनके खिलाफ शिकायत की गई हो तो उसे पुलिस प्रशासन केा अवगत कराए।
सपा विधायक पर एफआईआर प्रकरण में सीओ को हटाया जाना भी चर्चा का विषय है लेकिन पुलिस का यह अपना मामला है। इसमें क्या होना है यह उन्हें ही देखना है। लेकिन मेरा मत है कि शहर में शांति और कानून व्यवस्था तथा भाईचारा बना रहे डॉक्टरों को ओपीडी और चिकित्सीय कार्य बंद ना करना पड़े अतुल प्रधान को आमरण अनशन और उनके समर्थकों को आत्मदाह तक ना पहुंचा पड़े इसके लिए दोषियों पर कार्रवाई तो जरूर होनी चाहिए लेकिन फिलहाल मंडलायुक्त और एडीजी व आईजी डीएम एसएसपी को जनप्रतिनिधियों के साथ इस बारे में बैठक कर इस समस्या का समाधान खोजना चाहिए और बैठक में सभी दलों के जनप्रतिनिधि पत्रकार समाजसेवी जागरूक नागरिक भी हों जिससे वहां होने वाली चर्चा को लेकर कोई बाहर निकलकर किसी को गुमराह ना कर पाए।
मैं मरीजों के अभिभावकों की इस राय से सहमत हूं कि मोटी फीस लेकर खोखेनुमा दुकानों में मरीजों को देखने वाले डॉक्टरों की क्लीनिकों की जांच हो कि यह मानक के अनुकूल हैं या नहीं। दूसरे मरीज से जो फीस ली जाती है उसकी रसीद भी अभिभावकों को मिलनी चाहिए। जो दवाई लिखते हैं वो हर मेडिकल स्टोर पर मिल जाए और हिंदी में साफ शब्दों मंें उसका लिखा हो। पीएम द्वारा जेनेरिक दवाईयों को दिए जा रहे बढ़ावे और मरीजों पर आर्थिक बोझ ना बढ़े इसलिए सभी डॉक्टर जेनेरिक दवाई लिखे ऐसे आदेश भी जांच समिति को करने चाहिए।

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