Tuesday, May 28

जूनियर डॉक्टरों पर जिला महिला अस्पताल का जिम्मा, डफरिन का हाल-बेहाल

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मेरठ 06 मार्च (प्र)। कहने को तो जिला महिला चिकित्सालय में चिकित्सकों की फौजी है, लेकिन ये किसी काम की नहीं लगती। डफरिन का हाल-बेहाल है और सिस्टम भी लुंज-पुंज हो रहा है। अधिकांश वरिष्ठ चिकित्सक महिलाओं व नवजात शिशुओं का उपचार करने से कतराते हैं। यहां उपचार का जिम्मा जूनियर डॉक्टरों के कंधो पर है। सर्जरी के कैसे भी बड़ी संख्या में रेफर किए जा रहे हैं।

शहर के बीचो-बीच बने जिला महिला चिकित्सालय में व्यवस्थाओं का बोलबाला हो रहा है। यहां करीब 20 चिकित्सक हैं। इनमें महिला रोग विशेषज्ञ, सर्जन, बाल लोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट, पैथोलॉजिस्ट, एनेस्थीसिया और आयुष के चिकित्सक शामिल हैं। डॉक्टरों की पूरी फौज होने के बावजूद यहां से बड़ी संख्या में महिला मरीज मेडिकल कॉलेज या प्राइवेट चिकित्साको के पास उपचार करने को मजबूर है। अस्पताल में रोजाना करीब 300 महिलाएं उपचार को आती हैं। जिनको मेडिकल कॉलेज या सुभारती मेडिकल कॉलेज के जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर देखते हैं।

लगभग पूरी ओपीडी इन जूनियर डॉक्टरों के हाथ में है। रोजाना करीब छह सात प्रसव होते हैं। जबकि मात्र दो-तीन आॅपरेशन किए जाते हैं। आॅपरेशन के अधिकांश मरीज को मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है। आॅपरेशन के लिए मरीजों को अस्पताल मे स्टाफ इतना डरा देता है कि वह मेडिकल कॉलेज को छोड़कर प्राइवेट चिकित्सकों के पास चले जाते हैं। अस्पताल में एक्स-रे और खून की अनेक जांचों के लिए लैब बनी हुई हैं। यह सुविधा मरीजों के लिए निशुल्क है, लेकिन चंद मरीजों की ही जांच कराई जाती हैं। यहां नवजात शिशु के बीमार पैदा होने पैदा होने पर उनके उपचार की भी पूरी व्यवस्था है, लेकिन नवजात के बीमार होने या बीमार पैदा होने पर उन्हें दूसरी जगह दिखाने के लिए कहा जाता है।

जननी सुरक्षा योजना के तहत सरकार द्वारा सरकारी अस्पताल में प्रसव करने वाली ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को 1400 रुपये तथा शहरी क्षेत्र की महिलाओं को एक हजार प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है, जिसकी राशि उनके बैंक खाते में जाती है, लेकिन यहां दलाल कुछ मरीजों से प्रसव करने के नाम पर पहले ही अवैध वसूली कर लेते हैं। आमिर रोड निवासी आरिफ ने बताया कि उसने पत्नी को जिला महिला चिकित्सालय में दिखाया था। जहां डॉक्टर ने कुछ जांच लिखी, लेकिन अस्पताल में उक्त जांच नहीं की गई। उन्हें बाहर जांच करने के लिए कहकर टरका दिया गया।

जिला अस्पताल की प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डा. ज्योत्सना कुमारी का कहना है कि अस्पताल में रोजाना करीब 300 मरीज का उपचार किया जाता है। छह सात प्रसव रोजाना होते हैं और दो-तीन आॅपरेशन किए जाते हैं। जिन मरीजों की हालत गंभीर होती है या गर्भ में नवजात शिशु की हालत गंभीर होती है तो ऐसी स्थिति में मरीज को मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है। यहां से किसी मरीज को किसी प्राइवेट अस्पताल नहीं भेजा जाता और न ही किसी मरीज से किसी भी कार्य के लिए पैसे लिए जाते हैं। जो लोग आरोप लगा रहे हैं, वह निराधार है। जननी सुरक्षा योजना का धन लाभार्थी के बैंक खाते में जाता है।

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