Friday, April 12

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुलायम और सोनिया गांधी सपा कांग्रेस में उत्पन्न गतिरोध दूर कराये

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बहुजन समाजवादी पार्टी जैसे मजबूत दल के अलग रहने के बावजूद विपक्षी गठबंधन हुआ। और उसकी ताकत का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि गठबंधन के नाम में इंड़िया को लेकर सत्ताधारी दल के नेताओं ने खूब बवाल मचाया। पूर्व में जानकारी अनुसार 2018 में कांग्रेस मध्यप्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा को हराकर अपनी सरकार बनाने में सफल हुई थी लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में वह इन तीनों राज्यों में 65 लोकसभा सीटों में से वह मात्र 3 सीटों पर ही जीत दर्ज करा पाई थी। जिसे विपक्षी वोटों के बिखराव का परिणाम ही कह सकते है। अब कुछ अनुभवी विपक्ष के नेताओं के प्रयासों से गठबंधन की मजबूती से बंधी डोर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा के बीच टिकट बंटवारे को लेकर ढीली पड़ गई लगती है। और दोनों की जिद के परिणाम में कहीं ये खुल ही ना जाए इसे लेकर भी सोच विचार विपक्षी दलों में होने की बात सुनाई दे रही है लेकिन अभी कहीं इसका समाधान होता नजर नहीं आ रहा। हां तेलगांना में सत्ताधारी दल भारत राष्ट्र समिति और कांग्रेस में भी इसी मुद्दे को लेकर विवाद की बात सुनाई दे रही है। इसके परिणाम क्या हो सकते है ये जग जाहिर है मगर पता नहीं सपा और कांग्रेस के नेताओं को इसका आभास क्यों नहीं हो रहा है। जबकि इस बिन्दु को लेकर सत्ताधारी दल व्यगं करने में भी पीछे नहीं है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह बोले दिल्ली में दोस्ती राज्यों में कुश्ती तो यूपी के उप मुख्यमंत्री केशवप्रसाद मौर्या कह रहे है कि अखिलेश बखिलेश भाषा का इंतेमाल ठीक नहीं।
बताते चले कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमल नाथ ने यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में कहा कि अखिलेश बखिलेश तो यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि पिता का उन्होंने नहीं किया सम्मान। मुझे लगता है कि यह सब उकसावे में आकर कुछ नेताओं के द्वारा उत्पन्न किया जा रहा विवाद है। क्योंकि ऑल इंड़िया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शाहबुद्दीन रिजवीं का कहना है कि सपा अध्यक्ष नाकामी छिपा रहे है मुसलमान दूसरों पर करे विचार।
इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि एक समय में देश की सबसे बड़ी पार्टी और वर्तमान में भी जनाधार वाले राजनीतिक दलों में से एक कांग्रेस बड़ा दल है। और उससे सम्मान सभी को देना चाहिए। लेकिन यह भी सही है कि जब क्षेत्रीय दल बड़े दलों से गठजोड़ करते है तो उनकी इच्छा रहती है कि अपना वजूद मजबूत करने के लिए कुछ ज्यादा प्रतिनिधित्व मिले और इसमें कोई बुराई भी नहीं है।
कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी ने जयपुर में कहा कि बड़े उद्योगपतियों को सींचना भाजपा की नीति है। तो सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव ने बीते दिवस शाहजहांपुर यूपी में कहा कि भाजपा अगर सत्ता में आई तो छिन्न जाएगा वोट देने का अधिकार। मुझे लगता है कि जब दोनों दलों के नेता ये समझ रहे है और जानते है कि अगर भाजपा जीती तो क्या क्या हो सकता है तो उन्हें इस बार हो रहे विधानसभा चुनावों और आने वाले लोकसभा चुनावों में अपने हितों को थोड़ा सा नजरअंदाज कर विपक्षी गठबंधन इंड़िया की मजबूती के लिए प्रयास करने चाहिए। यही वक्त की तो सबसे बड़ी मांग है ही। दूसरी तरफ विपक्षी दलों के नेताओं पर जो कार्रवाई हो रही है भविष्य में उन्हें रोकने के लिए भी यह आवश्यक कहा जा सकता है।
यह चर्चा भी सुनाई देती है कि कांग्रेस सपा से ज्यादा राष्ट्रीय लोकदल पर ध्यान दे रही है। राजनीति में कौन किसे साथ लेकर चलना चाहता है इस पर कोई प्रतिबंध नहीं है। लेकिन कांग्रेस को भी यह सोचना चाहिए कि सपा का विपक्षी में मजबूत जनाधार है और खासकर यूपी में भाजपा के बाद इस समय सपा ही सबसे मजबूत राजनीतिक दल है इसलिए उसे नजरअंदाज करने से भले ही सपा को थोड़ा बहुत नुकसान हो लेकिन समाजवादी के उम्मीदवार जो मध्य प्रदेश में वोट काटेगें उसका कम या ज्यादा असर कांग्रेस उम्मीदवारों पर पड़ेगा। फिर भी चुनाव भले ही जीतकर कांग्रेस सरकार बना ले मगर वोटों की संख्या कम होगी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। अब रही बात रालोद के अध्यक्ष जयंत चौधरी की तो बहुत दिनों के राजनीतिक वनवास के उपरांत यूपी विधानसभा के बीते चुनावों में उनके कुछ विधायक सपा से गठबंधन होने के बाद जीतकर आये और सबसे बड़ी बात सपा मुखिया ने दोस्ती का फर्ज निभाते हुए जयंत चौधरी को राज्यसभा में भेजकर केन्द्र और प्रदेश दोनों की राजनीति में रालोद का वर्चस्व खड़ा करने की अच्छी शुरूआत कराई और राजनीति का भविष्य भी सपा और रालोद का अच्छा है। अगर ये कांग्रेस से समझौता नहीं करते है तो भी लोकसभा चुनाव में पहले के मुकाबले अगर ये स्थिति बनी रहती है तो सपा कांग्रेस गठबंधन के विजयी उम्मीदवारों की संख्या में बढ़ोत्तरी होने से इनकार नहीं किया जा सकता।
हमें लगता है कि जो ये विवाद उत्पन्न हुआ है उसे दूर करने के लिए मुलायम सिंह जी और सोनिया गांधी जी को विचार कर अपनी अपनी पार्टियों और जनता के हित में इस गतिरोध को दूर कराना चाहिए। क्योंकि सरकार किसी की भी बने अगर विपक्ष मजबूत होता है तो हर मामले में संतुलन बने रहने की बात से इनकार नहीं किया जा सकता। (प्रस्तुतिः अंकित बिश्नोई संपादक व पूर्व सदस्य यूपी मजीठिया बोर्ड)

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