Friday, August 29

प्रधानमंत्री की डिग्री सार्वजनिक करने की मांग क्यों उठी, सूचना अधिकार का दुरूपयोग करने और इसे अपने हित में इस्तेमाल करने वालों पर हो सख्त कार्रवाई संबंधित नियमों में किया जाए बदलाव

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गरीब और मजबूर व्यक्ति तो उससे संबंध जानकारियां समय से ना मिलने और उसके कार्य का क्या हुआ यह पता ना चलने की आए दिन मिलने वाली शिकायतों और हर कार्य पारदर्शी वातावरण में नियमानुसार हो इसे ध्यान रखते हुए सूचना का अधिकार कानून अस्तित्व में आया। तब ये लगा था कि अब हर व्यक्ति का काम जल्दी निपटेगा और उसे सम्मान देने के साथ साथ संबंधित नौकरशाहों द्वारा कार्य का निस्तारण भी प्राथमिकता से किया जाएगा।
जहां तक पता चलता है उससे यह बात सामने आ रही है कि शुरूआती दौर में कुछ वर्ष इसका लाभ आम आदमी को मिला लेकिन फिर कुछ लोगों ने इसे कई तरह के हथियार के रूप में प्रयोग किया तो अफसर भी सूचना देने की बजाय इससे संबंध पत्रावलियों को कागजी चक्रव्यूह में फंसाने के साथ साथ इतने अड़ंगे लगाने लगे कि जिसके लिए यह कानून बना था वो बेचारा इसका लाभ लेने से वंचित रह गया और जो लोग इसे विभिन्न मामलों में लाभकारी जानकार इसका उपयोग करने लगे वो इतना निरंकुश हो गए कि यह भी भूल गए कि कौन सी बात जनहित की है और कौन सी नहीं। किस मामले में जानकारी मांगी जानी चाहिए किसमें नहीं। परिणामस्वरूप यह नियम जैसा कि लोग कहते हैं कुछ लोगों की कमाई, शौक तो कुछ के अन्य कारणों का माध्यम ज्यादा बन गया। यह भी कि जैसा सूत्रों से पता चलता है एक एक व्यक्ति ने कहीं कहीं तो 1400 सूचना के अधिकार के तहत पत्रावली मांगने की कार्रवाई की जिससे इसका महत्व भी अब कम होता जा रहा है क्योंकि सरकारी बाबाू इससे संबंध मामलों में घुमाने का काम ज्यादा करते हैं सूचना देने की बजाय। कई मामले ऐसे होते हैं कि उनकी सूचना का कोई उपयोग नहीं होता। वो क्यों मांगी जाती है यह भी किसी को पता नहीं होता। कुछ साल पूर्व करीब 10 साल की बच्ची ने जानकारी मांगी कि महात्मा गांधी केा राष्ट्रपिता किसने और क्यों कहना शुरू किया। अब उस साल की बच्ची तो खुद यह प्रयास नहीं करती और उसे इससे क्या लेना और जब से गूगल आया तब से 90 प्रतिशत जानकारी तो उसके माध्यम से मिल जाती है लेकिन फिर भी कुछ लोग खाली बैठकर इस कानून का दुरूपयोग करने की कोशिश करते हैं । इसके उदाहरण के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में मांगी गई जानकारी कि उनकी डिग्री सार्वजनिक की जाए। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीआईसी के उस आदेश को रद कर दिया जिसमें पीएम मोदी की स्नातक की डिग्री से संबंधित जानकारी का खुलासा करने के निर्देश दिए गए थे। न्यायमूर्ति सचिन दत्ता द्वारा सीआईसी के आदेश को चुनौती देने वाली दिल्ली विवि की याचिका पर यह फैसला सुनाया। बताते चलें कि बीती 27 फरवरी को यह फैसला सुरक्षित कर लिया गया था। आरटीआई कार्यकर्ता नीरज के आवेदन पर सीआईसी ने 1978 में बीए कला स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले छात्रों के अभिलेखों के निरीक्षण को 21 दिसंबर 2016 को अनुमति दी थी। बताते चलें कि पीएम मोदी ने भी यह परीक्षा 1978 में उत्तीर्ण की थी। अदालत ने सीआईसी के आदेश पर 23 जनवरी 2017 को इस पर रोक लगाई। और अब फैसले में स्पष्ट कहा गया है कि यह कोई जनहित नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि शैक्षिक योग्यता ऐसी संबंेधानिक जरूरत नहीं है जो संवेधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए जरूरी हो। कहा गया कि सार्वजनिक कार्याे से असम्मत कायर्ो्र को गोपनीयता के आधार पर समाप्त नहीं करता है। कहा गया कि आरटीआई सरकारी काम में पारदर्शी बनाने के लिए बनाया गया है ना कि सनसनी फैलाने के लिए।
इस मामले में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश फरमा रहे हैं कि यह समझ से परे है कि पीएम की शैक्षिक योग्यता का विवरण गुप्त क्यों रखा गया है। वो अपने हिसाब से सही कह रहे होंगे लेकिन उन्हें यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर इस विवरण को सार्वजनिक क्यों किया जाए। मुझे भी लगता है कि ऐसे मामलों में कोई जनहित नहीं होता। इसलिए सिर्फ सनसनी फैलाने के दृष्टिकोण से ऐसी जानकारियां मांगे जाने पर स्पष्ट रूप से रोक लगनी चाहिए। क्योंकि इससे जहां अदालत का समय बर्बाद होता है वहीं आम आदमी से संबंध मामले प्रभावित होते हैं। मुझे लगता है कि 2005 में लागू हुए इस नियम को आम आदमी के हित में प्रभावशाली बनाने के लिए सरकार को कानून के जानकारों से सलाह कर इसमें सुधार हो और बिना किसी कारण के जानकारियां मांगने वालों पर एकमुश्त जुर्माना लगाने के साथ साथ समय की बर्बादी और प्रभावित हो रहे कार्यों को ध्यान में रखते हुए दोषी पाए जाने पर कार्रवाई हो। और ऐसी व्यवस्था हो कि जिस उददेश्य से यह कानून लागू किया गया था वो ही बना रहे। इसे लागू करने वाले व्यक्ति का देखा गया था वो सपना साकार हो। पात्रों को इसका लाभ मिले और जब तक इसमें बदलाव की जरूरत हो तब तक अदालत जिस प्रकार गलत दृष्टि से दायर की जाने वाली जनहित याचिका पर जुर्माना लगाते हुए ऐसा करने वालों को फटकार लगाई जाती है ऐसा ही इसमें होना चाहिए।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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