Wednesday, June 12

उन्नाव के एसपी ऑफिस में युवक ने लगा ली आग, सीओ पर प्रताड़ना का आरोप

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उन्नाव 28 दिसंबर। पुरवा के भूलेमऊ गांव निवासी दलित श्रीचंद्र व उसके परिवार को पुलिस ने इस कदर परेशान किया कि वह खुद को फूंकने पर विवश हो गया। जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे श्रीचंद्र ने बताया कि उसने सीएम से लेकर पुलिस के हर उच्चाधिकारी की चौखट पर माथा टेका, आईजीआरएस पर शिकायत की पर पुलिस ने गोलमोल रिपोर्ट लगा उसे आत्मदाह करने पर मजबूर कर दिया।

श्रीचंद्र ने आरोप लगाया कि सीओ पुरवा दीपक सिंह ने रुपये लेकर विपक्षियों का पूरा साथ देकर उसे मौत के मुंह में धकेल दिया। एसपी दफ्तर से जिला अस्पताल तक श्रीचंद्र बार-बार सीओ पुरवा को दोषी बताता रहा। जिला अस्पताल में उसने सदर कोतवाल प्रमोद मिश्र से कहा कि पंजाब में रहने वाले भाई फूलचंद्र से वीडियो कॉल पर बात कराओ।

बात हुई तो भाई का चेहरा देखते ही चीखते हुए कहा कि भईया मैं बचूंगा नहीं, मौत हो गई तो इसके जिम्मेदार पुरवा सीओ व अन्य सभी अधिकारी होंगे। किसी को छोड़ना नहीं। बोला क्या रिश्वत इंसान की जान से ज्यादा कीमती है। बड़ा भाई उसकी बात सुनकर वह हालत देख फूट-फूटकर रो पड़ा।

बड़े भाई मूलचंद्र ने बताया कि पुरवा पुलिस विपक्षियों से मिली है। सीओ पुरवा ने विपक्षियों से रुपये लेकर पांच दिन बाद उस पर व भाई श्रीचंद्र के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों पर विपक्ष की महिला से तहरीर लेकर मुकदमा लिखवा दिया। इतना ही नहीं उस पर कुल्हाड़ी से हमला करने वालों के नाम रुपये लेकर निकाल दिए। गिरफ्तारी के नाम पर एक का शांतिभंग में चालान किया। कार्रवाई की जगह सीओ पुरवा सुलह का दबाव बना रहे थे।

आग लगाने के बाद भी श्रीचंद्र के अंदर पुलिस के प्रति गुस्सा था। डाक्टर उसका इलाज करने के लिए जैसे ही आगे आते, चीखते हुए बोलता मेरा इलाज मत करो। पहले कप्तान को बुलाओ। कप्तान के आने के बाद ही इलाज कराऊंगा। तीन की छुट्टी पर गए कप्तान सिद्धार्थ शंकर मीना की जगह एएसपी अखिलेश सिंह अस्पताल पहुंचे। वह बार-बार कहता रहा मेरा चेहरा कैसा था, अब कैसा हो गया। यह सब पुलिस की वजह से हुआ है।

एसपी कार्यालय गेट पर आने वाले फरियादियों की पहले रजिस्टर में इंट्री होती है। इसके बाद उन्हें प्रवेश दिया जाता है। श्रीचंद्र शिकायत लेकर पहले कई बार आ चुका था। सुनवाई न होने पर वह बुधवार दोपहर वह एसपी दफ्तर के पीछे के गेट से बोतल में केरोसिन लेकर अंदर घुसा। सीओ सिटी के केबिन के बाहर पहुंचा और झट से खुद पर केरोसिन उड़ेल कर माचिस की तीली जला आग लगा ली। उसे जलता देख एएसपी अखिलेश सिंह व सीओ सिटी आशुतोष केबिन से बाहर आ गए और बचाने की कोशिश में जुट गए।

घटना की जानकारी मिलने के बाद आइजी तरुण गाबा अपराह्न तीन बजे एसपी कार्यालय पहुंचे। एएसपी व सीओ सिटी के साथ पहले घटनास्थल देखा फिर मेन गेट पर पहुंचकर फरियादियों के इंट्री रजिस्टर को देखा। वहां मौजूद दारोगा संतोष रत्नाकर ने बताया कि गेट पर उनके अलावा पांच सिपाही मौजूद रहते हैं। जो फरियादियाें को चेक करते है। श्रीचंद्र पीछे के गेट से अंदर आ गया।

एसपी कार्यालय से पुरवा पहुंचे आइजी ने उस सहन को देखा, जिस पर श्रीचंद्र का मुस्लिम पक्ष से विवाद चल रहा है। भतीजे महेंद्र व पिता रामस्वरूप ने भी उन्हीं आराेपों को दोहराया जो आग लगाने वाले श्रीचंद्र ने सीओ पुरवा व उन्नाव पुलिस पर लगाए थे। आइजी ने मामले की दोबारा विवेचना कराने व दोषियों पर कार्रवाई का भरोसा दिया। उन्हाेंने सीओ पुरवा दीपक सिंह से भी मामले की बिंदुवार जानकारी ली।

पीड़ित श्रीचंद्र के पिता रामस्वरूप ने बताया कि 1985 में पड़ोसी घसीटे अली का मकान खरीदा था। मकान के सामने ही सहन को लेकर घसीटे के अन्य स्वजन अपना दावा कर रहे हैं। 1990 में उक्त सहन की भूमि का बाद न्यायालय में चल रहा हैं। बताया कि एक दो बार न्यायालय से फैसला हमारे पक्ष में आ चुका हैं। लेकिन मुस्लिम पक्ष के लोगों ने दोबारा अपील की। जिस पर मुकदमा अभी चल रहा हैं।बताया कि तीन जनवरी को पेशी की तारीख लगी है, जिसमें फैसला आने की उम्मीद हैं।

भतीजे महेंद्र ने बताया कि बुधवार सुबह समय लगभग 11 बजे श्रीचंद्र सीओ पुरवा की शिकायत करने के लिए बाइक से एसपी कार्यालय जाने की बात कह निकला था। श्रीचंद्र ने वहा कैसे आग लगा ली इसकी किसी को जानकारी नहीं हैं। एसपी कार्यालय से आए फोन के बाद जानकारी होने पर पूरा परिवार लखनऊ केजीएमयू के लिए रवाना हुआ है।

भतीजे महेंद्र ने बताया कि स्थानीय पुलिस व सीओ द्वारा जांच में आरोपितों को बचाए जाने की एसपी से सात बार शिकायत की गई लेकिन सुनवाई नहीं हुई। वहीं दो बार एडीजी से भी शिकायत की।आरोप हैं कि सीओ ने मुख्य आरोपित अनीश को ही मुकदमे से बाहर कर दिया। जिससे आहत होकर श्रीचंद्र ने यह कदम उठा लिया।

श्रीचंद्र पांच भाइयों में सबसे छोटा हैं। बड़े भाई केशनचंद्र, हरिश्चंद्र, फूलचंद्र, मूलचंद्र हैं। पिता रामस्वरूप, मां राजेश्वरी ,पत्नी संध्या व सात वर्षीय बेटा श्रेयांश हैं। श्रीचंद्र लगभग दो वर्ष पूर्व कस्बे में किराए की दुकान में ज्वैलर्स का काम करता था। वर्तमान में वह लकड़ी खरीदने व बेचने का व्यापार करता है। उसके आग लगाने से पत्नी व बच्चा बेहाल है।

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