हर साल गर्मी सदी्र बरसात आना परंपरागत है। अब बरसात है तो गमीै और सर्दी भी होगी। सभी जानते हैं अभी तक गर्मी तो मार्च से हो जानी थी लेकिन जैसा आज अचानक मौसम सुहावना हो गया तो गर्मी में भी सर्दी का अहसास हुआ। आज एक खबर पढ़ी कि आधे अप्रैल में ही पारा चालीस के पार पहुंचा। यह कोई नई बात तो नहीं। हर साल ही पारा चालीस के पार और पचास तक भी पहुंचता है। बड़े आदमी एसी कूलर में बैठकर इसका अहसास ना कर पाए लेकिन गरीब तो हमेशा इस मौसम से संघर्ष करता ही रहा है। मगर ऐसी खबरें छपने से कि पारा ४० के पर पहुंचा से मानसिक रुप से उन लोगों को भी गर्मी लगने लगती है जो इसका अहसास नहीं होने देते। भटटों पर मजदूर, खेतों में किसान, सड़कों पर ठेले वाले रिक्शा वाले गर्मी में काम कर रहे हैं। उनमें से किसी से यह नहीं सुना कि गर्मी बहुत है काम नहीं कर पा रहे। अगर ठंड पहुंचाने वाली कंपनियों को फायदा पहुंचाने की बात है तो खबरचियों की नौकरी छोड़कर दूसरा काम कर लें। कभी पढ़ते हैं कि सौ साल पहले इतनी गर्मी बरसात या ठंड हुई थी तो यह इस बात का प्रतीक है कि ऐसा हमेशा होता रहा है। इसलिए मेरे जैसे को गर्मी का अहसास ना कराया जाए तो अच्छा है क्योंकि इससे गरीब को अहसास होता है कि वह अपने परिवार को गर्मी से नहीं बचा पा रहा है। इसलिए ऐसी खबरें बढ़ा चढ़ाकर ना निकाली जाए तो अच्छा है।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)
मजदूर भटटों पर किसान खेतों में मेहनत कर रहा है उसे गर्मी का अहसास नहीं है तो चालीस पार पहुंचा पारा से मानसिक उत्पीडन क्यों
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