मेरठ, 17 अप्रैल (दैनिक केसर खुशबू टाईम्स)। उपभोक्ता हित और बिल्डरों की निरंकुश कार्यप्रणाली पर अंकुश लगाने और दुकान घर प्लाट खरीदने वाले नागरिकों का उत्पीड़न ना हो इस तथ्य को दृष्टिगत रख गठित रेरा द्वारा अपने पूर्व चेयरमैन वरिष्ठ आईएएस श्री राजीव कुमार के समय तो इतनी विवादित नहीं रही जितना अब प्रतिष्ठित आईएएस सेवा के गिनेचुने ईमानदार अधिकारियों में शुमार श्री संजय भूसा रेड्डी के द्वारा चार्ज संभालने के बाद से हो रही है।
कभी इसमें सदस्य बनाये जाने के लिए विवाद उठता है तो कभी कॉलोनाईजरों को लाभ पहुंचाने की बाते चर्चाओं में आती हैं। बीते दिनों तो माननीय न्यायालय द्वारा रेरा की कार्यप्रणाली को लेकर इसकी आवश्यकता पर ही सवाल उठा दिया गया जनहित में। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है बिते दिनों राज्यसभा सदस्य भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी द्वारा राज्यसभा में इस पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि उत्तर प्रदेश में रेरा कानून पूरी तौर पर विफल है। उन्होंने हजारों रियल स्टेट प्रोजेक्ट अधूरे खरीदार परेशान सख्त रेरा दिवालिया कानून में संशोधन की स्पष्ट रूप से मांग की। उन्होंने केंद्र सरकार से रेरा कानून में बदलाव करते हुए इसे और अधिक सख्त और अधिक प्रभावी बनाने की मांग की। श्री वाजपेयी ने कहा कि फ्लैट खरीददारों की स्थिति पीड़ादायक है उन्होंने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में हजारों रियल एस्टेट प्रोजेक्ट अधूरे पड़े है एनसीएलटी में लंबित हैं। बिल्डर खुद को दिवालिया घोषित करने के कानून की आड़ में बचकर निकल रहे हैं इन पर करोड़ों रूपया सरकार का भी बकाया है। उपभोक्ता जिंदगीभर की कमाई पूंजी लगाता है फिर भी उसे फ्लैट नहीं मिलते क्योंकि रेरा कानून का सही पालन नहीं हो पा रहा है।
अभी पिछले दिनों रेरा ने प्रदेश के कई जिलों में 32 सौं करोड़ की 11 रियल एस्टेट की परियोजनाओं को मंजूरी दी लेकिन जानकारों का कहना है कि इसमें भी कुछ अनियमिता रहीं है जिनकी जांच होनी चाहिए। और नई रियल एस्टेट परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले रियल एस्टेट परियोजना संचालकों और उपभोक्ताओं के बीच बढ़े विवादों का निस्तारण कराया जाये। कुछ दिन पूर्व उत्तर प्रदेश रियल एस्टेट क्षेत्र में घर और दुकान खरीदने वालों के लिए एक बड़ी राहत दी गयी जिसके तहत गैर पंजीकृत प्रमोटर्स भी अब यूपी रेरा उत्तर प्रदेश भू संपदा विनियामक प्राधिकरण के दायरे में आ गये है। लेकिन यह बड़े ताज्जुब की बात है कि रेरा के चेयरमैन और सदस्यों के द्वारा मजबूत संयुक्त प्रयास कर इन्हें लागू करने का प्रयास से संबंध खबरे सुनने को नहीं मिल रही हैं।
पूरे प्रदेश में कुछ माफिया सरकारी जमीन घेरकर और विवादित भूमि पर मानचित्र पास के नाम पर अवैध निर्माण करने में संलग्न हैं लेकिन रेरा किसी भी रूप में ना तो खुद उन पर अंकुश लगा रही है और ना ही आवास विकास प्राधिकरणों आदि से लगवा पा रही है।
इस संदर्भ में प्राप्त एक खबर के अनुसार उत्तर प्रदेश के एस्टेट क्षेत्र में घर और दुकान खरीदने वालों के लिए यह बड़ी खबर यह है कि अब गैर पंजीकृत प्रमोटर भी यूपी रेरा (उत्तर प्रदेश भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण) के दायरे में आ गए हैं। अभी तक हजारों खरीदार प्रोजेक्ट पंजीकृत न होने के कारण खुद को ठगा महसूस कर रहे थे और विधिक राहत के लिए भटक रहे थे, लेकिन अब ऐसे आवंटी भी प्रभावी पैरवी के जरिये प्रतिपूर्ति और कब्जा प्राप्त कर सकेंगे। सूर्वी रेरा ने रेरा अधिनियम 2016 की धारा 85 के तहत अपने सामान्य विनियम- 2019 के नियम 24 और 47 में 10व महत्वपूर्ण संशोधन किया है, जो 25 मार्च से प्रभावी हो गया है। इस निर्णय से प्राधिकरण पर मुकदमों का बोझ बढ़ना तय है। वर्तमान में पंजीकृत प्रमोटरों से जुड़े 50 हजार से अधिक बाद पहले से लंबित हैं।
सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने यूपी रेरा की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी कर इसे सेवानिवृत्त नौकरशाहों का पुनर्वास केंद्र बताया था। नई व्यवस्था लागू होने से प्राधिकरण की चुनौतियां व जिम्मेदारी बढ़ गई हैं। यूपी रेरा के अध्यक्ष संजय भूसरेड्डी ने बताया कि यह संशोधन रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने और आवंटियों के हितों की रक्षा के लिए किया गया है। इससे शिकायत निवारण प्रक्रिया प्रभावी होगी।
बताते चलें कि रेरा की उदासीनता का ही शायद परिणाम है कि यूपी के हर शहर, देहात और उनसे लगे गांवों में अन्य उपयोग की भूमि पर कच्ची कालोनियां अवैध रूप से कट रही हैं। कॉमर्शियल और रिहायशी कॉम्पलैक्स बन रहे हैं और आश्यर्च इस बात का है कि इनके द्वारा माचचित्र पास के बड़े-बड़े बोर्ड लगाये जाते हैं लेकिन यूपी सरकार के निर्माण नियमों का पालन करना तो दूर उनके मानदंड ना मानने के उदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे है।
स्मरण रहे कि हर निर्माण के बाहर पास मानचित्र का बोर्ड लगा होना अनिवार्य है रेरा में पंजीकृत है या नहीं इसका भी स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए मगर विकास प्राधिकरणों आवास विकास आदि के अवैध निर्माण रोकने और नियमों का पालन कराने वाले अफसर यह काम तो कर ही नहीं रहे हैं माननीय मुख्यमंत्री जी के पोर्टल पर जो शिकायतें इस संदर्भ में जाती है उनका भी इनके द्वारा फर्जी निस्तारण किया जा रहा है अब सवाल उठता है कि डा. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने भी राज्यसभा में मुद्दा उठाया माननीय न्यायालय अपना मत व्यक्त कर चुके हैं सरकार भी नियमों का पालन करने का निदेश दे रही है मगर जिम्मेदार निरंकुश क्यों हैं यह समझ से बाहर है। माननीय मुख्यमंत्री जी अब तो इस संदर्भ में आप ही नियमों का पालन कराने का कोई सकारात्मक प्रयास करा सकते हैं ऐसा नागरिकों का मानना है।
क्योंकि जानकारों का कहना है कि निर्माण के नियमों का उल्लंघन करने वालोें में या उन्हें प्रोत्साहन देने वाले लोगों में सत्ताधारी दल के साथ ही अन्य राजनीतिक दल के नेताओं और प्राधिकरण व आवास विकास के संबंधित अधिकारियों का भरपूर समर्थन बताया जा रहा है अगर ऐसा नहीं होता तो खुलेआम अवैध निर्माण और कच्ची कालोनियों की यूपी में बाढ़ नहीं आ रही होती।
