नई दिल्ली 17 अप्रैल। देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (एलपीजी) की कीमतों में उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए सरकार एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। सरकार इन ईंधनों के लिए एक विशेष वित्तीय व्यवस्था (मूल्य स्थिरता कोष) बनाने पर विचार कर रही है, ताकि जरूरत पड़ने पर बाजार में दखल देकर कीमतों को नियंत्रित किया जा सके और आम लोगों को राहत दी जा सके।
मामले से जुड़े दो वरिष्ठ अधिकारियों ने यह जानकारी दी। उनके मुताबिक, यह योजना इसलिए बनाई जा रही है क्योंकि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई हैं और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यह प्रस्ताव उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के स्तर पर विचाराधीन है।
रणनीतिक भंडार से अलग होगा
विशेष कोष से तैयार नया तेल-गैस भंडार देश के मौजूदा रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार से अलग होगा। अभी भारत के पास लगभग 5.3 मिलियन टन कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार है, जिसका इस्तेमाल आपात स्थिति में किया जाता है, जबकि नया फंड कीमतों को स्थिर रखने के लिए उपयोग होगा।
कैसे काम करेगा यह कोष
सरकार इस कोष के जरिए पेट्रोल, डीजल और एलपीजी का एक तय मात्रा में भंडार (रिजर्व) तैयार करेगी। इसके लिए तेल रिफाइनरी कंपनियों के साथ समझौते किए जाएंगे। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें अचानक बढ़ेंगी या आपूर्ति बाधित होगी, तब इस भंडार को बाजार में जारी किया जाएगा, जिससे कीमतों पर दबाव कम होगा और लोगों को राहत मिलेगी। मामले से जुड़े अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह योजना सब्सिडी नहीं है। इसका इस्तेमाल केवल असामान्य स्थिति में कीमत बढ़ने पर ही किया जाएगा।
इसलिए पड़ रही जरूरत
पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के बाद कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर से बढ़कर करीब 100 डॉलर तक पहुंच गई है। हार्मुज जलडमरूमध्य से आपूर्ति प्रभावित हुई है। इसके कारण कुछ निजी पेट्रोल पंपों ने दाम बढ़ा दिए हैं। सरकारी तेल कंपनियों ने कुछ विशेष ईंधन के दाम बढ़ाए हैं, लेकिन आम पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बदले हैं। सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपये प्रति लीटर घटा दी है। फिर भी सरकारी कंपनियों को नुकसान हो रहा है। कमर्शियल गैस सिलेंडर के दाम काफी बढ़ गए हैं।
भंडारण क्षमता बढ़ानी होगी
अधिकारियों के अनुसार, रिफाइनरियों के पास अपने काम के लिए भंडारण है, लेकिन नए भंडार के लिए काफी ज्यादा जगह की जरूरत होगी। इस पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार का कहना है कि पेट्रोलियम उत्पादों के लिए इस तरह का फंड बनाना व्यावहारिक है। उनके अनुसार, आवश्यक वस्तुओं की तरह जब कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार खुदरा स्तर पर हस्तक्षेप कर सीमित मात्रा में सस्ती आपूर्ति उपलब्ध कराती है।
