मेरठ 16 दिसंबर (दैनिक केसर खुशबू टाइम्स)। यूके स्थित बाकी फाउंडेशन द्वारा आयोजित यूनेस्कों केे सहयोग से संचालित जीईएमएस एजुकेशन के दसवें संस्करण में 149 देशों से 5 हजार से अधिक नामांकन प्राप्त हुए। ग्लोबल टीचर प्राईज के लिए इनमें भारतीय मूल के संस्थापक शनिवाकी ने कहा कि ग्लोबल टीचर प्राईज की स्थापना एक सरल उद्देश्य के साथ की गई थी। इस बार एक खबर के अनुसार मेरठ स्कूल के शिक्षा सुधांशु शेखर पांडा व जम्मू कश्मीर के शिक्षक मेहराज कुर्शीद मलिक तथा झुग्गी बस्तियों ग्रामीण समुदाय में शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत रूबल नागी के नाम भी इस सूची में शामिल है। बताते है कि दस लाख अमेरिकी डालर के ग्लोबल टीचर प्राईज 2026 के लिए शीर्ष 50 की सूची में मेरठ के केएल इंटरनेशनल स्कूल के प्रधानाचार्य सुधांशु शेखर समेत तीन भारतीय शिक्षकों के नाम शामिल है। शिक्षक दिवस पर उन्हें राष्ट्रपति जी द्वारा उन्हें सम्मानित किया गया था सुधांशु शेखर पांडा को।
अपने शहर प्रदेश और जिले में किसी भी क्षेत्र में किसी को कोई पुरस्कार मिले तो उससे बड़ी बात वहां के निवासियों के लिए हो नहीं सकती। सुधांशु शेखर जी को शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रपति पदक से सम्मानित किया गया। अब वो ग्लोबल टीचर प्राईज की दौड़ में वो शामिल है। आज जब यह खबर पढ़ने को मिली तो एक चर्चा मौखिक रूप से कई जगह सुनाई दी कि सुधांशु शेखर जी को यह सम्मान मिलना चाहिए उन्हें बधाई है। लेकिन उनकी अपनी उपलब्धियां क्या है इससे भी आम आदमी को इससे भी अवगत होना चाहिए। सिर्फ सीबीएसई शिक्षा के क्षेत्र में कोर्डीनेटर की भूमिका निभाने सीबीएसई की नीतियों और कार्यों को आगे बढ़ाने आदि के लिए यह पुरस्कार मिल रहा है तो इससे शिक्षा का नहीं तालमेल और कार्डीनेटर करने में सक्षम व्यक्ति सम्मान होना चाहिए था शिक्षा के लिए नहीं। क्योंकि कई प्रमुख लोगों से यह सुनने को मिला कि छोटे बड़े स्कूलों में बहुत अच्छे अनुभवी टीचर मौजूद है वो यूपी बोर्ड सीबीएसई और आईएसई में भी शामिल हो सकते है। बीते दिनों आये परीक्षा परिणामों में कई स्कूलों ने देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसमें उनके प्रधानाचार्याें का योगदान रहा। खुद मैं भी पिछले कई दशक से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हूं मगर एक बड़े नामचीन स्कूल में अपनी सेवा देने और उसी के दम पर सीबीएसई में एक पहचान बनाने में सफल सुधांशु शेखर जी सफल है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में और वो भी सरकार की शिक्षा नीति के तहत। गली मौहल्लों निचली बस्तियों व आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा देने या सुविधा विहीन छात्रों को आगे बढ़ाने में सुधांशु शेखर जी का कोई योगदान दिखाई नहीं देता है। अगर है तो अपनी उपलब्धियां बताये कि बेसहारा कितने बच्चों को शिक्षा दिलाकर किसी स्थान पर पहुंचाया हो। या ऊपर दिये गये संवर्ग के क्षेत्रों में जाकर शिक्षा की अलख जगाई हो अथवा जहां जहां वो रहे वहां वहां उन क्षेत्रों में रहने वाले सुविधा विहीन कितने छात्रों को शिक्षा दिलाने में योगदान कर सरकार की शिक्षा नीति को बढ़ावा देने की कोशिश की। मैं उन्हें अगर यह ग्लोबल टीचर प्राईज मनी सम्मान मिलता है तो मुझे भी बहुत खुशी होगी। मगर जागरूक नागरिकों को यह भी सोचना होगा कि किसी नामचीन बड़े स्कूल में प्रधानाचार्य के पद पर तैनात हो जाने और एक अच्छे कोर्डीनेटर की भूमिका निभाते हुए स्वयं व स्कूल को आगे लाने वालों स्कूलों को ही नहीं सरकार की नीति के तहत बच्चों को शिक्षित कराने वाले अन्य क्षेत्रों में सक्रिय शिक्षकों भी जो पात्र हो उन्हें भी सम्मान मिलना चाहिए जिससे सामाजिक संतुलन बना रहे। अगर सिर्फ बड़े लोग ही अपनी सुविधाओं व तालमेल के आधार पर यह सम्मान प्राप्त करते रहेंगे तो उन सीधे साधे शिक्षकों का क्या होगा जो अपनी मेहनत से गरीब बच्चों को विभिन्न प्रयास कर शिक्षित बनाने और फिर उन्हें समाज में सम्मान दिलाने का काम कर रहे है।
