Thursday, June 13

ढोल गंवार शूद्र पशु नारी का अर्थ कोर्ट ने समझाया, रामचरित मानस पर स्वामी प्रसाद मौर्य को नसीहत भी दी

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लखनऊ 07 नवंबर। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने रामचरित मानस के कुछ अंशों को उठाकर उन पर विवादित टिप्पणियां करने और प्रतियां जलाने के मामले में समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को सीख दी है। कोर्ट ने कहा है कि किसी भी ग्रंथ या अभिलेख में दिए गए कथन सही परिप्रेक्ष्य में ही पढ़े और रखे जाने चाहिए। कहीं से भी कोई एक अंश बिना सम्पूर्ण संगत तथ्यों के रखना सत्य कथन नहीं कहा जा सकता। कुछ परिस्थितियों में ऐसा कथन असत्य कथन भी हो सकता है।

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने यह टिप्पणी स्वामी प्रसाद मौर्य की याचिका को खारिज करने वाले अपने निर्णय में किया है। स्वामी प्रसाद की ओर से दाखिल याचिका में प्रतापगढ़ के कोतवाली सिटी में दर्ज एफआईआर की विवेचना के बाद दाखिल आरोप पत्र और निचली अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने संबंधी आदेश को चुनौती दी गई थी। याचिका 31 अक्तूबर को ही खारिज हो गई थी, हालांकि विस्तृत निर्णय सोमवार को जारी किया गया।

सुनवाई के दौरान सपा नेता के अधिवक्ता ने यह दलील दी थी कि उन्होंने रामचरित मानस की चौपाइयों को सिर्फ उद्धत किया है। जिन चौपाइयों को उन्होंने उद्धत किया है, वे मानस में हैं, लिहाजा उन्होंने कोई असत्य बात नहीं कही। इस पर न्यायालय ने उपरोक्त टिप्पणी की। न्यायालय ने यह भी कहा कि उदाहरण के लिए कोई भी विधि अथवा न्यायिक निर्णय भी हमेशा पूरे ही पढ़े जाते हैं।

विधि के प्रावधानों का अथवा न्यायिक निर्णयों का कोई अंश बिना, उसके समस्त संगत प्रावधानों के नहीं प्रस्तुत किया जा सकता है। न्यायालय ने कहा कि इसी प्रकार जब रामचरित मानस की कोई चौपाई उद्धारित की जाए तो यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि उसमें कहा गया कथन किस पात्र ने किस परिस्थिति में किससे कहा है।

न्यायालय ने कहा कि याची द्वारा कही गई चौपाई ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी’ वास्तव में समुद्र ने श्रीरामचंद्र जी से इस आशय के साथ कही है कि वह स्वयं एक जड़-बुद्धि है और वह इस कारण से की गई भूल की क्षमा मांग रहा है। न्यायालय ने आगे कहा कि ऐसी परिस्थिति में स्वयं को जड़-बुद्धि मानने वाले एक पात्र द्वारा कहा गया कथन जब समस्त संगत तथ्यों के संदर्भ के बिना प्रस्तुत किया जाता है तो यह सत्य का सही विरूपण नहीं हो सकता है।

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