मेरठ 29 जनवरी (प्र)। चौधरी चरण सिंह विवि के अटल सभागार में व्याख्यान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ पदाधिकारी और संघ के प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे.नन्द कुमार ने देश में जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जताई। वहीं उन्होंने कहा कि हिंदुओं के भी कम से कम तीन बच्चे तो होने ही चाहिए। आरएसएस के 100 वर्ष पर उन्होंने कहा कि व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है संघ की शाखा।
संघ की ‘आर्गनाइजर’ पत्रिका द्वारा आरएसएस के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में संघ की विकास यात्रा, राष्ट्र निर्माण में इसके योगदान और भविष्य के संकल्पों पर विस्तार से चर्चा हुई। मुख्य वक्ता और प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नन्द कुमार ने कहा कि डा. हेडगेवार ने 1925 में संघ की स्थापना उस समय की थी, जब समाज हीन भावना से ग्रस्त था। स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि आजादी को बनाए रखने के लिए समाज का संगठित होना अनिवार्य है। कहा कि संघ की शाखा केवल एक घंटे का खेल या मनोरंजन नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सीसीएसयू के पूर्व कुलपति और संघ के सह प्रांत संघचालक प्रो. नरेंद्र कुमार तनेजा ने संघ के ‘पंच परिवर्तन’ (पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, स्व का जागरण, नागरिक कर्तव्य और सामाजिक समरसता) पर प्रकाश डाला।
संघ के मुख पत्रिका आर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि 1947 से ही यह पत्रिका राष्ट्रवाद और संस्कृति के प्रसार के अपने संकल्प पर अडिग है।
केतकर ने कहा कि संघ की 100 वर्षों की यात्रा अद्वितीय रही है। इस यात्रा को जन-जन तक पहुंचाया जाए इसलिए आर्गनाइजर देश भर में ऐसी व्याख्यान माला के माध्यम से संवाद कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। गुजरात और उत्तर प्रदेश में यह कार्यक्रम चल रहे हैं आने वाले समय में सभी प्रान्तों में यह कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
कार्यक्रम स्थल पर सभी सरसंघ चालकों की इलेक्ट्रानिक प्रदर्शनी लगाई गई। संघ के क्षेत्र प्रचारक महेंद्र, पूर्व सांसद राजेंद्र अग्रवाल, संघ के सह क्षेत्र प्रचार प्रमुख तपन कुमार, सुरेंद्र कुमार, डा. वीरोत्तम तोमर, आइआइएमटी उपकुलाधिपति के मयंक अग्रवाल, डा. जितेंद्र चिकारा, प्रो. संजीव कुमार शर्मा, डा. दिशा दिनेश, प्रशांत कुमार, डा. शीतल गहलोत, डा. नीलम सिंह आदि उपस्थित रहे.
