मेरठ 03 अप्रैल (प्र)। अवैध निर्माणों पर देशभर के लिए सख्त संदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ के चर्चित सेंट्रल मार्केट प्रकरण में कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने साफ कहा कि आदेशों के बावजूद कार्रवाई न होना आंखों में धूल झोंकने जैसा है और इसे गंभीरता से लिया जाएगा। गुरुवार को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच में सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद की ओर से पेश स्टेटस रिपोर्ट पर तीखी टिप्पणी की गई।
कोर्ट ने पाया कि 860 अवैध संपत्तियों की पहचान के बावजूद अब तक सिर्फ एक ही निर्माण हटाया गया है, जो बेहद निराशाजनक है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि हर अवैध निर्माण को गिराना होगा और इसमें किसी तरह की ढील बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही यह भी सामने आया कि कई जगह अब भी अवैध ढांचे जस के तस खड़े हैं और कुछ मामलों में भूमि उपयोग बदलने के आवेदन देकर कार्रवाई टालने की कोशिश की जा रही है।
सबसे गंभीर टिप्पणी मेरठ मंडल के तत्कालीन कमिश्नर के 27 अक्टूबर 2025, आदेश पर हुई, जिसमें सेंट्रल मार्केट क्षेत्र में ध्वस्तीकरण रोकने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे अपने निर्देश के विपरीत माना।
चेयरमैन को 4 अप्रैल तक रिपोर्ट के आदेश
कोर्ट ने परिषद के चेयरमैन पी. गुरुप्रसाद को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के बाद अंतिम मौका देते हुए निर्देश दिया है कि 4 अप्रैल तक एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जाए, जिसमें अब तक की कार्रवाई और आगे की स्पष्ट कार्ययोजना बताई जाए। इसके साथ ही 6 अप्रैल, 2026 को अगली सुनवाई तय करते हुए चेयरमैन को दोबारा कोर्ट में उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए हैं।
सिर्फ कागजी कार्यवाही नहीं जमीन पर एक्शन दिखाएं
सेंट्रल मार्केट प्रकरण में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता जताते हुए साफ कर दिया कि कानून से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत ने शुरुआत में ही अपने पूर्व आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि ये निर्देश पूरे देश में लागू हैं और इनका पालन सुनिश्चित करना संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी है सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि निर्माण कार्यों में स्वीकृत नक्शे और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है।
यदि किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित अधिकारियों को तुरंत कार्रवाई करनी होगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी विभागों के बीच समन्वय जरूरी है और किसी भी प्रकार की देरी या लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा। साथ ही यह संकेत भी दिया गया कि नियमों के उल्लंघन के मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई की जा सकती है। अदालत के इस रुख से साफ है कि अब व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने पर विशेष जोर रहेगा।
प्रशासन की जवाबदेही की बड़ी परीक्षा
सोमवार को पूर्व कमिश्नर ऋषिकेश भास्कर यशोद को भी तलब किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख ने साफ कर दिया है कि अवैध निर्माण के मामलों में अब किसी भी स्तर पर लापरवाही या देरी बर्दाश्त नहीं होगी। अब सभी की निगाहें 6 अप्रैल की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां प्रशासन की जवाबदेही की असली परीक्षा होगी।
