Thursday, April 30

तलाक के बाद बेटी को ढोल-नगाड़ों के साथ घर लाए पिता, फूल-मालाएं पहना किया स्वागत

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मेरठ 04 अप्रैल (प्र)। जहां आज भी कई जगह बेटियों को बोझ समझा जाता है और उन्हें हर हाल में समझौता करने की सलाह दी जाती है, वहीं मेरठ का एक परिवार समाज के लिए मिसाल बनकर सामने आया है। यहां एक पिता ने अपनी बेटी को तलाक के बाद ढोल-नगाड़ों और जश्न के साथ वापस घर लाकर एक नई सोच को जन्म दिया है।

मेरठ के ज्ञानेंद्र शर्मा अपनी बेटी प्रणिता शर्मा को तलाक के बाद पूरे सम्मान के साथ घर वापस लाए है। इस दौरान परिवार के लोग ढोल की थाप पर नाचते-गाते नजर आए और मिठाइयां बांटकर खुशी जाहिर की। बेटी के स्वागत में फूल-मालाएं पहनाई गईं और पूरे माहौल में उत्सव जैसा माहौल दिखा।

खास बात यह रही कि परिवार के सभी सदस्य एक जैसी टी-शर्ट पहने हुए थे, जिस पर प्रणिता की तस्वीर के साथ “I Love My Daughter” लिखा हुआ था। हर चेहरे पर बेटी की घर वापसी की खुशी साफ झलक रही थी।

ज्ञानेंद्र शर्मा ने समाज को संदेश देते हुए कहा कि बेटी को भी बेटे की तरह परिवार का समान सदस्य मानना चाहिए। उन्होंने कहा, “समाज में यह सोच रही है कि बेटी की डोली जाती है तो अर्थी ही लौटनी चाहिए। इसमें थोड़ा बदलाव तो आया है, लेकिन असली बदलाव अभी बाकी है। बेटी को हर हाल में ससुराल में रहने के लिए मजबूर करना गलत है।” उन्होंने आगे कहा, अगर मेरी बेटी अपनी शादी में दुखी थी, तो उसे खुशी देना मेरा दायित्व था। मैंने कोई एलीमनी, मेंटेनेंस या सामान नहीं लिया, सिर्फ अपनी बेटी को वापस लाया हूं।

पिता ने यह भी कहा कि महिलाओं के सशक्तिकरण की बात सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसे जमीन पर उतारना जरूरी है। आगे उन्होंने कहा की मेरी बेटी शादी में बाजे-गाजे के साथ विदा हुई थी, आज तलाक के बाद मैं उसे उसी सम्मान के साथ वापस लाया हूं।

वहीं प्रणिता शर्मा ने बताया कि उनकी शादी 14 दिसंबर 2018 को हुई थी और पिछले 7 सालों में उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि पति और ससुराल पक्ष की ओर से उन्हें मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित किया गया। उन्होंने आगे बताया की “मैं कई बार वापस गई, यह सोचकर कि सब ठीक हो जाएगा, लेकिन हालात नहीं बदले। मैं मानसिक रूप से बहुत कमजोर हो चुकी थी, लेकिन मेरा परिवार मेरे साथ खड़ा रहा।

प्रणिता ने अन्य महिलाओं को संदेश देते हुए कहा कि अगर वे किसी तरह की प्रताड़ना झेल रही हैं, तो उन्हें अपने लिए खड़ा होना चाहिए।

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