Sunday, April 14

संयुक्त राष्ट्र महानिदेशक दें ध्यान! 104 महिलाओं का यौन शोषण करने वाले यूएनओ व डब्ल्यूएचओ से संबंध दोषियों के खिलाफ हो कार्रवाई

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यौन शोषण वैसे तो देशव्यापी समस्या खबरों के हिसाब से बनती जा रही है। पीड़िताओं को इंसाफ मिले इसके लिए हर स्तर पर नियम कानून बनाए गए हैं। उसके बावजूद एक समाचार के अनुसार गांव की पंचायतों से लेकर यूएनओ व डब्ल्यूएचओ तक ऐसे मामलों में पर्दा डाला जा रहा है। ऐसे में आखिर पीड़ित को इंसाफ कैसे मिलेगा।
बताते चलें कि अफ्रीकी देश कांगो में इबोला वायरस के प्रकोप को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कुछ वर्ष पूर्व 104 महिलाओं का यौन शोषण किए जाने की खबर पढ़ने को मिली। डब्ल्यूएचओ ने इस मामले में मुआवजे के तौर पर प्रत्येक महिला को बीस हजार रूपये 250 पाउंड डॉलर दिए और मामले को रफा दफा कर दिया। बताते हैंं कि यौन शोषण मामले को निपटाने के लिए डब्ल्यूएचओ ने डॉक्टर गाया गैमहेवेज द्वारा किया गया था। डब्ल्यूएचओ के गोपनीय दस्तावेजों के हवाले से खबर में कहा गया है कि पीड़ितों में से एक तिहाई का अब तक पता नहीं लगाया जा सका है और पीड़िताओं ने मुआवजे को अस्वीकार कर दिया। आश्चर्य की बात यह है कि डब्ल्यूएचओ ने यौन शोषण पीड़िताओं की मदद के लिए 16 करोड़ रूपये 20 लाख डॉलर का एक सवाईवर असिस्टेस फंड बनाया था। लेकिन पीड़ितों की मदद के लिए फंड की एक फीसदी भी राशि खर्च नहीं की गई। मात्र 20 लाख रूपये खर्च कर इस मामले को खत्म करने की कोशिश की गई जबकि एक दर्जन पीड़िताओं ने इस पूरे फंड को ही अपर्याप्त बताया था। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि कांगो में भोजन की लागत सहित अन्य मानदंडों के आधार पर पीड़ितों को राहत पैकेज दिया गया है। इसके अलावा पीड़ितों को ज्यादा नकदी नहीं देने कें संबंध में वैश्विक नियमों का पालन किया गया है जिससे ज्यादा नकदी के चक्कर में उन्हें कोई नुकसान ना पहुंचा पाए।
संयुक्त राष्ट्र एजेंसी अभी तक आरोपियों को सजा दिलाने में नाकाम रही है। डब्ल्यूएचओ ने पाया कि कुछ 83 लोग हैं जिन्होंने यौन शोषण किया जिनमें से 21 डब्ल्यूएचओ कर्मी भी शामिल है।
कोड ब्लू अभियान चलाने वाली पाउला डोनोवान कहती हैं कि यह शर्मनाक है। तुच्छ रकम के लिए भी पीड़िताओं से प्रशिक्षण के नाम पर मजदूरी कराई गई। यूएनओ अधिकारियों को दंड से छूट के लिए यह सब हुआ बताते हैं।
सवाल यह उठता है कि पूरी दुनिया में महिलाओं के उत्थान और उन्हें यौन शोषण से बचाने के लिए अभियान चल रहे हैं और नियम भी बनाए जा रहे हैं। उसके बावजूद इबोला वायरस रोकने के लिए जिन महिलाओं का चयन किया गया उनसे मजदूरी कराने के साथ साथ यौन शोषण भी किया गया। जिम्मेदार कह रहे हैं कि ज्यादा नकदी इसलिए नहीं दी गई कि कोई पीड़िताओं को नुकसान ना पहुंचा पाए। 20 लाख डॉलर में से मात्र 2 लाख खर्च कर मुआवजे के नाम पर पीड़िताओं को थोड़ी सी धनराशि देकर मामले को रफा दफा करने की कोशिश की गई लेकिन इसके लिए जिम्मेदार लोगों को सजा पूरी तौर पर क्यों नहीं मिली यह विषय सोचनीय भी है और शर्मनाक भी क्योंकि जितना पढ़ने सुनने को मिलता है यूएनओ और डब्ल्यूएचओ विभिन्न क्षेत्रों में सुधार के लिए सुझाव देते नहीं थकते ग्रामीण कहावत दिया तले अंधेरा के समान खुद इतने बड़े यौन प्रकरण में दोषियों को सजा ना देना आधी आबादी में शामिल पीड़िताओं का अपमान और उत्पीड़न तो है ही। इससे यह भी पता चलता है कि अग्रणी क्षेत्रों में कैसे अपने कुकर्मो पर लीपापोती की जाती है। सवाल उठता है कि यूएनओ और डब्ल्यूएचओ के कार्यकर्ता एक तरफ यौन पीड़ितों को ज्यादा मुआवजा इसलिए नहीं दे रहे कि उन्हें कोई नुकसान ना पहुंचा पाए लेकिन अपने ऊपर खूब खर्च करते है। तो फिर पीड़ितों को न्याय क्यों नहीं।
मैं कोई बहुत बड़ा आदमी तो हूं नहीं और ना मुझे यूएनओ और डब्ल्यूएचओ के बारे में कोई विशेष जानकारी है लेकिन जब यौन उत्पीड़न की खबर पढ़ने को मिली तो लगा कि जिन्हें हम शराबी अपराधी की उपमा देते है वो ही नहीं सफेदपोश पढ़े लिखे भी ऐसे मामलों में कम दोषी नहीं है। गांव की पंचायतों से लेकर इनके द्वारा भी शब्दों की लीपा पोती कर पूजनीय माता बहनों का यौन उत्पीड़न को उसी प्रकार से दबाया जाता है। अगर 15 नवंबर 2023 के अमर उजाला में छपी इस संबंध में उक्त खबर सही है तो मेरा मानना है कि सबसे पहले तो इस यौन उत्पीड़न में शामिल सभी लोगों को उनके पदों से हटाकर उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज कराकर जेल भेजा जाए और फिर इन पीड़ितों को 20 लाख डॉलर का जो फंड बनाया गया था वो पीड़ितों को बराबर बांटकर दिया जाए। इसे देने में नियमो की आड़ लेकर कोताही करने वालों के खिलाफ भी जो संभव कार्रवाई हो सकती है वो की जाए। आखिर सारे मापदंड गरीब और मजबूर के लिए ही क्यों लागू होती है जिनकी आवाज उठाने वाला कोई नजर नहीं आता। मेरा संयुक्ट राष्ट्र महानिदेशक और सचिव से यह आग्रह है कि वो इस मामले में यूएनओ और डब्ल्यूएचओ के यौन उत्पीड़न में शामिल व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई कराकर भले ही यौन पीड़िताओं को जो कष्ट हुआ उसकी वापसी ना की जा सकती हो लेकिन मुआवजा मिलने और दोषियों को सजा होने से थोड़ी बहुत राहत तो जरूर मिलेगी। मुझे लगता है कि पीड़ित महिलाएं जिस देश से संबंध है वहां के राष्टाध्यक्ष विदेश और स्वास्थ्य तथा कानून मंत्रालय के अधिकारियों को भी इस मामले में कार्रवाई और दोषियों को सजा दिलाने की मांग करनी ही चाहिए। क्योंकि दोषी ऐसे ही बच गए तो भविष्य में जब किसी देश में कोई आपदा आएगी तो लोग अपनी बेटियों को पीड़ितों की मदद के लिए यूएनओ और डब्ल्यूएचओ के लोगों के साथ नहीं भेजेंगे। और यह संभावित पीड़ितों के साथ नाइंसाफी हो सकती हैं।

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