Thursday, August 28

बैंकों में मिलने शुरू हो जाएंगे साफ बड़े अक्षरों में हिंदी में फार्म और हो काम, राजभाषा ना जानने वाले इस्तीफा देकर बैठे घर, खाताधारक सरकार से करें मांग, घपले और घोटाले की संभावनाएं भी होंगी कम

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अंग्रेजी मानसिकता के गुलाम कुछ लोगों द्वारा हिंदी पढ़ने और बोलने वालों को अनपढ़ बताया जाता है। हो सकता है कि उनकी निगाह में यह बात सही हो लेकिन इसके उलट देखें तो हिंदी ना जानने वाले अंग्रेजी प्रेमी भी हिंदी भाषियों के लिए अनपढ़ की श्रेणी में आते हैं। समस्या तब आती है जब राजभाषा सरकारी कार्यालयों या बैंककर्मियों द्वारा हिंदी में काम करने में असमर्थता व्यक्त की जाती है।
देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी हर काम में पारदर्शिता लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं। सरकार के आदेश भी हैं कि सरकारी कर्मचारी को हिंदी का ज्ञान होना चाहिए। केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण भी अपना बजट हिंदी में पेश करती हैं। जहां तक पढ़ने को मिलता है रिजर्व बैंक के गर्वनर से लेकर अधिकारी और कर्मचारी हिंदी और अंग्रेजी दोनों में काम करते हैं क्योंकि कुछ पत्रावलियां पीएम तक पहुंचती है। ऐेसे में आम आदमी को बैंकों से जोड़ने की प्रधानमंत्री की मुहिम को उस समय गहरा धक्का लगता है जब प्राइवेट और सरकारी बैंकों के कर्मचारी इंग्लिश में बात करने और लिखने की बात कहते हैं कि हम हिंदी नहीं जानते।
पिछले कुछ सालों में बैंकों के मैनेजरों और अन्य कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले घोटालों और गलत तरीके से दिए जाने वाले लोन और कुछ लोगों के खाते में गडबड़ की खबरों और कुछ के जेल जाने से यह स्पष्ट होता है कि कभी भी किसी के साथ भी कोई चाहे तो अंग्रेजी ना जानने वालों के खातें में गडबड़ कर सकता है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार हर मौके पर हिंदी को बढ़ावा देने की बात करती है। मंत्रिमंडल या अन्य उच्च पदों पर लोग हिंदी में शपथ लेते हैं और विभिन्न मंत्रालय राष्ट्रभाषा को बढ़ावा देने के लिए प्रयासरत हैं। ऐेसे में बैंकों में हिंदी में काम ना होना आम आदमी के साथ बहुत बड़ी विडंबना पैदा कर रहे हैं।
मेरा मानना है कि वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के अधिकारी हिंदी का सम्मान करते हुए सभी सरकारी कार्यालयों और बैंकों में इसके प्रचलन को बढ़ाएं और जो हिंदी नहीं जानता उसे घर बैठाया जाए। जो भी हो बैंकों में जो आजकल नई नई कार्रवाई चल रही हैं और खाताधारकों को कभी केवाईसी तो कभी अन्य नामों पर बुलाकर कुछ पत्रावली मांगकर फार्म दिए जाते हैं। मेरी सरकार से मांग है कि बैंकों में खाताधारकों संग धोखाधड़ी ना हो और अंग्रेजियत के यह गुलाम उन्हें परेशान ना करें इसके लिए समस्त फार्म हिंदी में हो। कम से कम लिखा पढ़ी कराई जाए। सरकारी योजना के तहत खाताधारक को सभी पात्र सुविधाएं दिलाई जाएं वरना पीएम का जनधन खाता और हर व्यक्ति बैंक खाता खोले जैसे सपने साकार होने से पहले टूट सकते हैं। बैंक मैनेजरों को निर्देश दिए जाएं कि खाताधारक हिंदी में अपने फार्म चाहता है तो उसे उपलब्ध कराए जाएं ना कि खुद लिखने के नाम पर धोखाधड़ी की संभावनाओं को बल देने की कोशिश की जाए। क्योंकि जिसे संचालन करना है वो यही ही नहीं जानता कि सामने वाला अंग्रेजी में क्या भर रहा है। उसे क्या नुकसान हो जाए इसे कोई नहीं कह सकता।
मेरा अंग्रेजी ना जानने वालों से भी आग्रह है कि वो बैंक कर्मचारियों द्वारा भाषा विवाद की प्रक्रिया से सोशल मीडिया के माध्यम से वित्त मंत्रालय व पीएमओ को लिखे और बैंक मैनेजर को हिंदी में लिखकर दे कि उसे खाता संचालन के लिए हिंदी में फार्म दिलाएं जाएं। मेरा मानना है कि हिंदी लागू होने में देर नहीं लगेगी। कुछ साल पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम मेरठ आए तो सर्किट हाउस में प्रेसवार्ता में मैंने जो यह मुददा उठाया कि मैं इंग्लिश नहीं जानता आप हिंदी में बात करिए तो उस समय के डीएम को दुभाषिया बनाकर बैठाया गया। ऐसे ही एक सेना के अफसर ने अंग्रेजी में बोलना शुरू किया तो मैंने हिंदी में बोलने का आग्रह किया तो उन्होंने पूरा भाषण हिंदी में दिया। जब सुषमा स्वराज केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री थी तो वरिष्ठ भाजपा नेता शकुंतला कौशिक के साथ मैं प्रतिनिधिमंडल के साथ दिल्ली में उनके निवास पर मिलने गया। उन्हें बताया कि आप हमेशा हिंदी के लिए लड़ती रही और आपके विभागीय अधिकारी पत्रावली अंग्रेजी में जारी करते हैं तो उन्होंने अपने पीए को बुलाकर पूछा तो उन्होंने इसे सही बताया। तब से आज तक डीएवीपी की पत्रावली हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी में जाती है जो इस बात का प्रतीक है कि बैंक खाता संचालन में हम नही करना चाहते और यह बात सरकार तक पहुंचा दे तो हिंदी लागू हो सकती है और यह जो बैंक कर्मी हिंदी ना जानने की बात करते हैं वो सब हिंदी में काम करने लगेंगे। हम अपनी मातृभाषा में काम करने के लिए अंग्रेजी में बात करने वालों से हिंदी में काम करने की मांग करे तो हमारी बात मानी जाएगी और हिंदी में काम होने लगेगा। अब तो प्रशासनिक परीक्षाओं में भी हिंदी का बोलबाला शुरू हो रहा है। हिंदी स्कूलों के छात्र सिविल सेवाओं में अपनी प्रतिभाएं दिखाएं रहे हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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