Friday, August 29

भगवान का प्रसाद सबके लिए हैं हर तरह से लाभदायक, सड़क से हटकर भंडारे लगाए जाएं तो जाम से आम आदमी को मिल सकता है छुटकारा

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धर्म हर काल में सभी के लिए प्रेरणा देेने और सबके हित की सोचने का प्रतीक रहा है। धर्म को मानने वाले व्यक्ति हमेशा देश समाज और दीन दुखियों की सेवा प्रगति और उनके हितों की रक्षा के लिए संकल्पित रहता है ऐसा बुजुर्गो का कहना है क्योंकि दिन में कई बार भगवान का नाम लेने से हमें सदमार्ग पर चलने धोखाधड़ी से बचने और सहयोग की भावना को बढ़ावा देता है। दुनिया में गरीब अमीर ताकतवर और कमजोर कम बुद्धि और ज्ञानवान हमेशा रहे है और सभी की सोच और काम अलग होने के बाद भी ऐसा कनेक्शन जरूर रहा है जिससे यह सब आपस में जुड़े रहते हैं। जब भगवान को मानने वाले हमेशा यह सोचते हैं कि बिना उसकी मर्जी के कोई पत्ता भी नहीं हिल सकता लेकिन सबको उपर वाले ने ही बनाया है और जब उसने सबको एक समान नहीं किया तो आम आदमी क्या कर सकता है। मगर उसके बाद भी सांप्रदायिक सौहार्द और मानवीय संवेदनाएं और यह सोच कि असहाय मजबूर और कमजोर हैं तो हमारे भाई और समाज सुधारक धर्म उपदेश देने वाले हमेशा संदेश देते रहे हैं कि अपनों की मदद के लिए हमे आगे रहना चाहिए चाहे वह पड़ोसी हो या सहयेाग व परिजन। यह सभी अच्छी बातें हमें उस मार्ग पर चलने का संदेश देती हैं कि प्रभु सबको इतना दीजिए वो भी भूखा ना रहे पड़ोसी भी भूखा ना सोए। सामूहिक रूप से तो पूरी दुनिया में सरकारें ही यह सब काम नहीं कर पा रही हे आम आदमी की बात अलग है। भगवान ने कुछ ऐसी व्यवस्थाएं शुरू की जिनसे हर आदमी पेट भरकर सोए और उसके लिए मंदिरों में प्रसाद वितरण जगह जगह होने वाले भंडारों शादी समारोहों में बचा हुआ भोजन सही जगह पहंुचाने की व्यवस्था कायम की जो आज भी पूरे विधि विधान से चल रही है और इसमें बढ़ोततरी भी हो रही है। अब तो हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई गरीबों की सेवा और जरूरतमंदों को सहयोग व उनमें धार्मिक भावनाओं के तहत काफी काम कर रहे हैं लेकिन सिख समाज और सनातन धर्मी जैसा कि दिखाई देता है इस मामले में कुछ ज्यादा ही सक्रिय है क्योंकि देश के गुरूद्वारों में लंगर प्रसाद और सनातनधर्मियों द्वारा भंडारे खूब किए जा रहे हैं। कहते हैं कि सनातनधर्मियों द्वारा पूरे वर्ष कोई ना कोई धार्मिक आयोजन किया जाता रहता है ऐसे में वर्तमान में बड़ों के साथ साथ स्कूली बच्चे भी परिजनों से कहते हैं कि पूजा करा लो जन्मदिन तो अनाथ आश्रम या किसी ऐसे स्थान पर जहां भोेजन की आवश्यकता हो वहां मनाएंगे। ऐेसे कार्यक्रम और भंडारे वैसे तो सबके लिए वरदान हैं क्योंकि भंडारे का प्रसाद महत्वपूर्ण है। लेकिन जरूरतमंद और फिलहाल जो आर्थिक तंगी और रोजगार की कमी नजर आती है और इलाज पर खर्च होने के चलते कई परिवारों के यहां भरपेट खाना भी नहीं होता और गरीब और मध्यमवर्गीय व्यक्ति किसी के सामने ना हाथ फैला सकता है और ना मांग सकता है। ऐसे लोगों के लिए भंडारे पेट भरने और भगवान का गुणगान करने में एक महत्वपूर्ण कार्य बन जाता है। कहने का आश्य है कि जिस प्रकार भंडारों और लंगरों व आयोजनों के बाद प्रसाद बांटने की प्रथा बढ़ रही है उसमें और भी बढ़ोत्तरी होनी चाहिए क्योंकि इससे हर सोच पूरी होती है। और धार्मिक भावनाओं को बढ़ावा मिलता है। अच्छे विचारा आते हैं। ग्रामीण कहावत जैसी रही भावना जिसका का महत्व खत्म हो रहा है और जैसा खाओ अन्न वैसा रहे मन का भी कोई मोल नहीं रहा क्योंकि भगवान का भोग लगते ही बुराई अपने आप मिट जाती है। सरकार के सामने हर आदमी को भोजन उपलब्ध कराने की नीति को भी कामयाबी की ओर बढ़ाता है।
भंडारा लगाने वाले लोगों को नतमस्तक होकर प्रणाम किया जाना चाहिए। क्योंकि वो एक प्रकार से लोगेां की दुआओं और भगवान की कृपा से प्रेरणस्त्रोत हो जाते हैं। ऐसा अच्छा काम करने वालों से किसी को परेशानी हो यह कोई नहीं चाहेगा और धर्म के काम में लगे लोग सोच ही नहीं सकते। मेरा ऐसे काम में लगे महानुभावों से आग्रह है कि ज्यादा भंडारे लगाएं। गली मोहल्लों में भी यह व्यवस्था शुरू करें लेकिन एक उपकार आम आदमी पर कर दें कि जब भी भंडारा लगाएं तो लगने वाली भीड़ के वाहनों से आवागमन प्रभावित ना हो। इसके लिए समय और जाम में फंसने से ईंधन की बर्बादी ना हो भंडारे का पंडाल चौड़े स्थान पर लगाए और प्रसाद लेने वालों के वाहन ऐसी जगह खड़े कराएं जो जाम का कारण ना बने। तो भंडारे का धर्मलाभ कई गुणा बढ़ सकता है। अगर लगे कि किसी को इस बात का पता नहीं है तो आम आदमी का चालान काटने वाले हाकिमों को दिशा निर्देश देने चाहिए। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं जाम की समस्या आधी हो जाएगी। और चालान काटने पर जो आदमी बददुआएं देता है उससे भी जिम्मेदार बचे रहेंगे। यह सभी जानते हैं कि जब पुलिस प्रशासन कुछ तय करता है तो वो लागू होने से कोई नहीं रोक सकता। इसका जीता जागता उदाहरण बीते माह संपन्न हुई शिवरात्रि पर गंगाजल लेकर आने वाले कांवड़ियों के साथ जो उंचे डीजे कांवड़ चल रही थी पुलिस ने उनकी उंचाई कम की और डीजे की आवाज में डीजे की कमी कराई। आए दिन पढ़ने सुनने को मिलता है कि धार्मिक सवारी में डीजे की उंचाई कम कराई गई और आयोजकों ने ऐसा कर भी लिया तो मैं समझता हूं कि भंडारा और भोजन वितरण करने वाले नागरिक सड़क से हटाकर इस काम को करने में पीछे नहीं रहेंगे। नागरिक और अफसर संयम और मर्यादित भाषा में प्रयास करें तो सफलता जरूर मिलेगी। तब जाम से छुटकारा और वाहनों के चालान में कमी आएगी और हर आदमी खुश नजर आएगा क्योंकि उसे सड़क पर भगवान का प्रसाद लेने खड़ा नहीं होना पड़ेगा। जनहित में सबको ऐसा सोचना पड़ेगा वरना जो नियम कानून बनेंगे वो काफी भारी पड़ सकते है। क्योंकि ऐसी भीड़ में फंसकर कुछ मरीज बेमौत मारे जाते हैं।
(प्रस्तुतिः- रवि कुमार बिश्नोई संपादक दैनिक केसर खुशबू टाइम्स मेरठ)

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