Tuesday, June 18

पुरानी पेंशन बहाली, लोली पॉप देने की बजाए सरकार ले स्पष्ट निर्णय, इस मुद्दे पर खुशहाल देश भी है परेशान

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ज्यादा से ज्यादा लाभ हो आर्थिक आमदनी के साधन बढ़े परिवारों में खुशहाली आये और सुख सुविधा आसानी से जुटा पाए ये बात व्यापारी हो या उद्योगपति नौकरी पेशा हो या मजदूर सब चाहते है। इसमें कोई बुराई भी प्रथम दृष्टया नजर नहीं आती है।
मगर ये भी सही है कि हर क्षेत्र में ज्यादा चीज की इच्छा बुरी है जब तक आदमी संतोषी नहीं होगा तब तक किसी की भी इच्छाऐं पूर्ण होने वाली नहीं है चाहे वो सरकार से हो या परिवार के मुखिया से सबकी नई नई फरमाईश और ईच्छा कम नहीं होती है ये बात सभी जानते है।
और शायद इसीलिए आये दिन व्यापारी अपनी नई नई मांगे सरकार के सामने रख रहे है उद्योगपति अपनी समस्याऐं बताकर सबका ध्यान आर्कषित करने की कोशिश कर रहे है। नौकरी पेशा लोग पहले सुविधाऐं और तनख्वाह बढ़ाने को लेकर आवाज उठाते थे आजकल पुरानी पेंशन बहाली के लिए कर रहे है धरना प्रदर्शन।
मुझे लगता है कि इसमें कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि लोकत्रंत में अपनी बात कहने और मनवाने के लिए तरीके अगर शांतिपूर्ण है तो उसमें कोई बुराई भी नहीं है। जरूरी यह है कि जिसे उन्हें पूरा करना है वो अपनी स्थिति वर्तमान परिस्थितयों आर्थिक साधनो आमदनी के माध्यमों को देखते हुए डूलमूल तरीका अपनाने की बजाए जिस प्रकार देश की सरकार ने कोरोना के नियमों का पालन करने में मजबूती दिखाई थी उसी हिसाब से अपनी बात कहे जिससे कोई भी यह सोचकर न रहे कि यह तो सरकार की आदत है देर सबेर हमारी बात मान ही लेगी क्योंकि इसके चलते अपने मांगों के लेकर होने वाले आंदोलन धरने प्रदर्शन को लेकर जहां आम आदमी के सरकारी कार्यालय से संबंध कार्य रोजमर्रा के प्रभावित होते है वहीं इनके दौरान शांति और कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए जन और धन शक्ति दोनों ही बर्वाद होती है जिन्हें अगर साकारात्मक रूप से प्रयास में लाया जाए तो जहां विकास की गति तेज होगी वहीं कानून और शांति व्यवस्था तथा भयमुक्त वातावरण की स्थापना कायम होगी यह बात विश्वास से कहीं जा सकती है।
फिलहाल बात हम सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाली और उसके लिए होने वाले धरना प्रदर्शन और आंदोलनों की करे तो हमें यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि वोटों की राजनीति के चलते विपक्षी विचारधारा वाले राजनेता और पार्टियां तो पुरानी पेंशन बहाली की मांग का समर्थन हर हाल में करेंगे। और अगर इस संदर्भ में निर्णय लेने में सक्षम व्यक्तियों संस्थाओं और सरकार ने इस बारे में स्पष्ट निर्णय लेने के साथ ही हां न की मीठी लोली पोप देने बंद नहीं किया तो अभी तो कर्मचारी ही इस मामले में आंदोलनरत है कल को इनके परिवार के सदस्य और इनसे मिलने वाले भी विपक्षी की तरह सरकार से इनकी मांग मानने के लिए कहने लगेंगे।
अपनी बात कहना सबका अधिकार है उसे मानना या उस पर कितना पालन करना है यह उसे पूरी करने वालें को सोचना है। अपने देश में बताते है कि 2005 के बाद सरकारी नौकरियों पर नियुक्त होने वालों की पेंशन की व्यवस्था ज्यादातर नौकरियों में समाप्त कर दी गई है। और पुरानी पेंशन बहाली को लेकर जो हो रहा है वो सबके सामने है। इससे संबंध एक खबर के अनुसार पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) बहाली के लिए हो रहे धरने प्रदर्शन के बीच आरबीआई की एक रिपोर्ट ने दुनियाभर में पेंशन की मौजूदा व्यवस्था और इसके असर की तरफ सभी का ध्यान आकर्षित करा है। रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि अमीर देश भी बढ़ते पेंशन बोझ से परेशान है और अधिकांश देशों में भारत सरकार की तरफ से दी जाने वाली ओपीएस की जगह स्व-योगदान बाली एनपीएस को लागू करने की कोशिश की जा रही है कई बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों को एक जगह रखने वाली इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के 20 प्रमुख अमीर देशों में ही पेंशन दायित्व और पेंशन भुगतान के बीच 78 ट्रिलियन डालर (एक ट्रिलियन एक लाख करोड़ के बराबर) की कमी है, यानी सरकारों को इस राशि का इंतजाम कहीं ना कहीं से करना होगा। एशियाई देशों को लेकर यह रिपोर्ट कहती है कि फिलीपींस, थाइलैंड, वियतनाम पाकिस्तान जैसे देशों में सरकार की तरफ से पोषित पेंशन स्कीम है लेकिन चीन, श्रीलंका भारत, मलेशिया, इंडोनेशिया सिंगापुर जैसे देशों ने हाल के वर्षों में अपनी पेंशन व्यवस्था में कई तरह के सुधार किए हैं। इन देशों में कर्मचारियों के योगदान पर आधारित पेंशन की प्रणाली शुरू की गई है सरकारी कर्मचारियों को पेंशन देने की सबसे दरियादिली योजना चीन की थी. जिसके तहत कर्मचारियों से कोई योगदान नहीं लिया जाता था लेकिन उन्हें सेवानिवृत्त पर अंतिम वेतन का 80 से 100 प्रतिशत पेंशन दो जाते थे। इसकी व्यवस्था केंद्र, राज्य निकायों के वेतन से की जाती थी। हालांकि वर्ष 2015 में यह व्यवस्था बदल गई। अब वहां एक फंड का निर्माण होता है, जिसमें सरकार का योगदान कर्मचारी के वेतन का 20 प्रतिशत और कर्मचारी का योगदान आठ प्रतिशत होता है।
अमेरिका में भी पेंशन को लेकर हाल के वर्षों में काफी चर्चा हो रही है। वर्ष 2019 में अमेरिकी सरकार के पास पेंशन के लिए एकत्रित फंड उसके पेंशन दायित्व के मुकाबले 1.25 ट्रिलियन डालर कम था इसकी भरपाई के लिए सरकार को कर्मचारियों व नियोक्ताओं का योगदान खड़ाया गया है। अमेरिका के कुछ राज्यों में पेंशन के लिए फंड की कमी काफी गंभीर रूप ले चुकी है।

स्व-पोषित पेंशन व्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं कई देश
रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश देश स्व-पोषित पेंशन व्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं। चिली, डेनमार्क हंगरी, मैक्सिको, पोलैंड जैसे कुछ देशों में पूरी तरह से सरकार पीडित पैशन व्यवस्था है। वैसे इनमें से भी कई देश अपना पेंशन बोडस घटाने के लिए कई तरह के दूसरे उपाय कर रहे हैं। आस्ट्रेलिया, बेल्जियम किन जर्मनी, आयरलैंड स्वीडन जैसे विकसित देशों में पेंशन सुधार लागू हो चुका है। इन देशों में नियोक्ता और कर्मचारियों के योगदान वाली व्यवस्था को बढ़ा दिया गया है।

कई राज्यों में पेंशन दायित्व का बोझ तेजी से बढ़ा
रिपोर्ट में आरबीआइ ने एनपीएस की जगह ओएस को लागू करने को लेकर चेतावनी दी थी। इसके मुताबिक 1990 के दशक में भारतीय राज्यों का पेंशन बोझ उनके कूल जीडीपी का 0.6 प्रतिशत था जो वर्ष 2022-23 में पढ़ कर 1.7 प्रतिशत हो चुका है। अधिराज्यों के राजस्व में होने वाली वृद्धि के मुकाबले उनके पेंशन दायित्व का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। कई राज्य अपने कुल राजस्व संग्रह का 25 प्रतिशत हिस्सा पेशन भुगतान में कर रहे है।
ना तो मैं पुरानी पेंशन बहाली का विरोधी हूं और इसमें क्या निर्णय लेना है वो सरकार को तय करना है। मेरा तो सिर्फ इतना मानना है कि इसके कारण आम आदमी के सरकारी कार्यालयों से संबंध काम प्रभावित न हो इसके चलते होने वाले आंदोलन व धरना प्रदर्शन से लगने वाले जाम से आम आदमी का आवागमन न रूके और इनके चलते किसी मरीज को अस्पताल और किसी नौजवान को अपनी नौकरी पर पहुंचने पर कठिनाई न हो कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि किसी का भी कोई कार्य न रूके और उसे परेशानी न हो तो अच्छा तो यह है कि सरकार इस संदर्भ में स्पष्ट निर्धारित नीति को सबके सामने रख दे बिना किसी यह सोचे कि भविष्य में होने वाले चुनावों में उसे वोट कितने मिलेगे कितने नहीं। क्योंकि इसके चलते अगर कुछ मत कटेंगे लेकिन जो लोग परेशान हो रहे है उनका रूझान निर्णय लेने वालों के प्रति बढ़ेगा। जो भी एक दिन तो ये निगलने या उगलने की आदत हमें छोड़ने ही पड़ेगी। क्योंकि देश तभी सरलता से चल सकता है जब सरकार के इरादे मजबूत हो और ये बात कोरोना काल में सबको समझ आ चुकी है। क्योंकि मामला कोई भी रहा हो मगर जो निर्णय शासन स्तर पर हुआ उसका पालन सबने आंख मिचकर किया।

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