मेरठ 16 दिसंबर (प्र)। बिजली बंबा बाईपास के चौड़ीकरण के लिए सर्वे पूर्ण हो गया है। वहीं रिंग रोड का सर्वे 70 प्रतिशत हो चुका है, दो दिन में सर्वे का यह काम शत- प्रतिशत पूरा हो जाएगा। मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) ने दोनों के लिए अलग-अलग टीम लगाई थीं। इस सर्वे का उद्देश्य दोनों सड़कों को नए रूप में बनाने और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप माडल के तहत निर्माण की संभावना तलाशना है। इसी सप्ताह दोनों सर्वे रिपोर्ट का प्रस्तुतीकरण कमिश्नर भानु चंद्र गोस्वामी के समक्ष हो सकता है।
बुलंदशहर हापुड़ हाईवे से जुनिपुर रेलवे लाइन, दिल्ली रोड होते हुए दून बाईपास तक रिंग रोड बनाने के लिए लगभग 15 हेक्टेयर भूमि खरीदी जाएगी। इस पर 162 करोड़ रुपये खर्च होंगे। रिंग रोड के निर्माण में 300 करोड़ रुपये अलग से खर्च होंगे। इसमें लगभग 10 अंडरपास, तीन-चार फ्लाईओवर, नाला, विद्युतीकरण आदि काम शामिल हैं। जमीन खरीदने के लिए 100 करोड़ रुपये की व्यवस्था मेडा ने अपने कोष से की है लेकिन बाकी धनराशि की व्यवस्था नहीं हो सकी है। शासन ने इसके निर्माण के लिए स्थानीय स्तर पर व्यवस्था करने को कहा है। इसी तरह से बिजलीबंबा बाईपास के चौड़ीकरण पर भी लगभग 300 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसमें रजवाहा की पटरी किनारे जमीन खरीदी जाएगी, फिर कलवर्ट बनाकर उसके ऊपर सड़क बनेगी। यानी रजवाहा का पानी कलवर्ट के अंदर बहेगा। स्पष्ट है कि शासन से इतनी धनराशि नहीं मिल पाएगी, इसीलिए दोनों मार्गों को पीपीपी माडल पर बनाने की संभावना तलाशने का निर्देश मिला था। उसी क्रम में कमिश्नर ने नए सिरे से सर्वे कराया है।
हवा में लटका ओवरब्रिज
2011 में जब रिंग रोड के निर्माण के लिए शिलान्यास हुआ था तब समझौता हुआ था कि इस हिस्से के लिए जमीन मेरठ विकास प्राधिकरण (मेडा) खरीदकर देगा। पीडब्ल्यूडी को सड़क बनानी थी। शर्तों के मुताबिक, रेलवे ने ओवरब्रिज बनाकर दे दिया लेकिन मेडा ने जमीन नहीं खरीदी। इस कारण ओवरब्रिज के लिए एप्रोच रोड भी नहीं बन सकी। तब से ओवरब्रिज हवा में लटका है। जमीन नहीं मिली तो पीडब्ल्यूडी ने भी सड़क नहीं बनाई। फिर अधिकारियों एनएचएआइ से संपर्क किया। एनएचएआइ ने शर्त रखी कि जमीन खरीदकर दी जाए तो वह रिंग रोड बना सकता है। कुछ समय बाद एनएचएआइ ने इस शर्त पर भी इसे बनाने से इन्कार कर दिया। उसके बाद पीडब्ल्यूडी से 300 करोड़ रुपये का प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया लेकिन शासन ने धनराशि देने से मना कर दिया।
इसके बाद बिजलीबंबा बाईपास के चौड़ीकरण का प्रस्ताव पीडब्ल्यूडी से बनवाकर भिजवाया गया, जिसे शासन ने निरस्त कर दिया। कुछ समय बाद रिंग रोड़ बनाने के लिए फिर पीडब्ल्यूडी से 291 करोड़ रुपये का प्रस्ताव बनवाकर शासन को भेजा गया। इसमें शासन को बताया कि यदि जमीन पीडब्ल्यूडी खरीद देगा तो मेडा अपने कोष से सड़क बनाकर देगा। शासन ने यह प्रस्ताव निरस्त कर दिया। इसके बाद फार्मूला निकाला गया, यदि 24 मीटर चौड़ी सड़क दो टुकड़ों में बना दी जाए तो उसके लिए जमीन खरीदने पर खर्च 162 करोड़ रुपये आएगा।
शासन में तय हुआ कि 100 करोड़ रुपये मेडा देगा जबकि 62 करोड़ रुपये शासन स्तर से पीडब्ल्यूडी को दिए जाएंगे। शासन से 62 करोड़ नहीं आए न ही कोई पत्र । फिर पीडब्ल्यूडी और मेडा ने एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टाली । अब नए सिरे से सर्वे हुआ है।
पीपीपी माडल में यह होने की संभावना
पूरी परियोजना की लागत का खर्च कोई निवेशक वहन करे। इसके बदले में वह इन मार्गों से राजस्व अर्जन का माडल प्रस्तुत करे। जैसे- टोल आदि ।
निवेशक को धनराशि खर्च करने के बदले में एफएआर की छूट, भूउपयोग परिवर्तन शुल्क की छूट आदि दी जा सकती है।
