मेरठ 23 अगस्त (प्र)। सरकार ने छात्रवृत्ति वितरण में पारदर्शिता लाने के लिए ऑनलाइन प्रक्रिया लागू की थी। दावा किया गया था कि अब किसी बच्चे का हक नहीं मारा जाएगा भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, लेकिन जिले के हालात इसके उलट दिखाई दे रहे हैं। शहर और ग्रामीण क्षेत्रों के कई स्कूलों के बच्चे अब भी छात्रवृत्ति से वंचित हैं। गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए छात्रवृत्ति ही बच्चों की पढ़ाई का सहारा होती है, लेकिन जब यह भी भ्रष्टाचार और लापरवाही के शिकंजे में फंस जाए तो सवाल उठता है कि क्या सरकार की ऑनलाइन व्यवस्था महज दिखावा है? अब पिछली खामियों पर पर्दा डालने के लिए दो अक्टूबर को छात्रवृत्ति वितरण दिवस पर वर्ष 2025-26 के बच्चों को छात्रवृत्ति दी जाएगी।
बात सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी की नहीं है, बल्कि जिम्मेदार अफसरों और कॉलेज स्टाफ की लापरवाही भी खुलकर सामने आ रही है। सवाल यह है कि जब बच्चे समय से फॉर्म भरकर जमा कर रहे हैं, तो आखिर उनका वजीफा क्यों नहीं मिल रहा? स्थानीय स्कूल के 11वीं कक्षा के एक छात्र ने आपबीती सुनाई। उसने बताया कि नौवीं और 10वीं में छात्रवृत्ति का फॉर्म भरकर कॉलेज में जमा किया था। स्कूल स्टाफ ने उससे फॉर्म की एक फोटोकॉपी मांगी और वह उसी समय जमा कर दी। कुछ महीने बाद जब वजीफा न मिलने पर उसने पूछताछ की तो कॉलेज स्टाफ ने कहा कि कचहरी में दिखा दो वहां जब छात्र समाज कल्याण अधिकारी कार्यालय गया तो वहां जवाब मिला कि तुमने फॉर्म गलत भरा है, इसलिए छात्रवृत्ति नहीं मिलेगी। अब बड़ा सवाल यह है कि यदि फॉर्म गलत भरा गया था तो स्कूल ने उसी समय क्यों नहीं सुधारा?
किसी बच्चे को समस्या है तो मुझसे मिले
सुनील सिंह छात्रवृति वितरण में हो रही गड़बड़ियों के सवाल पर जिला समाज कल्याण अधिकारी सुनील सिंह का कहना था कि अब तक उनके पास इस तरह की कोई शिकायत औपचारिक रूप से दर्ज नहीं हुई है। उनका कहना था कि ऐसा कोई मामला मेरे संज्ञान में नहीं आया है। यदि किसी बच्चे को समस्या है तो वह सीधे मेरे पास आए शिकायत दे, तभी विभागीय स्तर पर कार्रवाई की जाएगी।
डर और खामोशी में बच्चे
ऐसा सिर्फ एक बच्चे के साथ नहीं है, बल्कि और कई स्कूली बच्चों का यही हाल है। कई स्कूलों के बच्चे शिकायत करने से डरते हैं उन्हें डर है कि कहीं कॉलेज प्रबंधन उनसे रजिश न निकाल ले या भविष्य में और मुश्किलें न खड़ी कर दे, लेकिन यहां फिर बड़ा सवाल खड़ा होता है क्या गरीब बच्चे अधिकारी के दफ्तर में जाकर अपनी शिकायत बार-बार दोहराने की ताकत रखते हैं?
विभाग खुद संज्ञान क्यों नहीं लेता?
हालांकि, अफसर के इस बयान से कई सवाल खड़े होते हैं पहली बात, क्या गरीब और जरूरतमंद बच्चे बार-बार अधिकारियों के दफ्तर का चक्कर लगाने में सक्षम है? दूसरी बात, जब ऑनलाइन प्रक्रिया पारदर्शिता का दावा करती है, तो शिकायत दर्ज कराने के लिए अलग से बच्चों पर बोझ क्यों डाला जा रहा है? अफसर की सफाई जिम्मेदारी से बचने जैसी लगती है। सवाल यह है कि शिकायत दर्ज होने का इंतजार करने के बजाए विभाग खुद संज्ञान क्यों नहीं लेता और क्यों नहीं यह जांचता कि किन बच्चों को छात्रवृत्ति नहीं मिली ?
गरीब बच्चों के सपने और पढ़ाई दांव पर
गीता, संतोष, सविता, शबनम आदि अभिभावकों ने कहा कि छात्रवृति बच्चों का हक है, किसी का एहसान नहीं जिम्मेदार अफसर और स्कूल स्टाफ इसे अपना फर्ज मानकर काम करें, वरना सरकार की योजनाएं सिर्फ खोखले दावे बनकर रह जाएंगी। गरीब छात्रों के सपने और पढ़ाई का भविष्य दांव पर है और अब समय है कि अधिकारी सीधे जवाब दें आखिर बच्चों का वजीफा कहां अटक रहा है?